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सर्वकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 190 में से

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पृष्ठ 40

३० स्पन्दकारिका
[ अवस्थाभेदों में स्वरूप की एकता ]
यहां तक सिद्ध किया गया कि आन्तर और बाह्य दोनों अवस्थाओं में एक ही स्वभाव
( स्पन्दतत्त्व ) व्याप्त है । इस विषय में यह शङ्का उठती है कि जब जाग्रत्, स्वप्न इत्यादि
अवस्थाओं में पारस्परिक भिन्नता प्रत्यक्षरूप में देखने में आती है तो इन सबों में एक ही
स्वभाव की व्यापकता का सिद्धान्त किस प्रकार स्वीकारा जा सकता है ? अगले सूत्र में इस
शङ्का का समाधान किया जा रहा है ।
जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने प्रसर्पति ।
निवर्तते निजान्नैव स्वभावादुपलब्धृतः ॥ ३ ॥
जाग्रदादिनापि भेदे प्रथमाने न तस्य स्वरूपम् आव्रियते, यस्माद् उपलब्धृरूपत्वं
त्रिष्वपि पदेषु साधारणम्, न तस्य स्वरूपान्यथाभावः, यथा विषस्याङ्कुरादिषु च
पञ्चसु स्कन्धेषु ॥ ३ ॥
अनुवाद
सूत्र—जाग्रत् इत्यादि भेदपूर्ण अवस्थाओं में भी, वही भेदरहित तत्त्व, समानरूप से
वेदक के रूप में व्याप्त रहता है । अतः इन अवस्थाओं के प्रसार के समयों पर भी वह तत्त्व
अनुभवी स्वभाव से निवृत्त नहीं होता है ॥ ३
वृत्ति—यद्यपि ( दैनिक जीवन में ) जाग्रत् इत्यादि अवस्थाओं में पारस्परिक भिन्नता
का अनुभव हो जाता है तथापि उन भेदकल्पनाओं के द्वारा उस अनुभवी के स्वरूप पर कोई
आवरण नहीं पड़ सकता है। इसका कारण यह कि उन तीनों अवस्थाओं में अनुभवी प्रमाता
का रूप साधारण होता है । उसके स्वरूप में उसी प्रकार कोई भी परिवर्तन नहीं होता है जिस
प्रकार विष के बीज से उगे हुए अंकुर इत्यादि के पाँचों स्कन्धों में अर्थात् मूल, शाखा, पत्र, फूल
और फल में व्याप्त विष के रूप में कोई अन्तर नहीं होता ॥ ३ ॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्र में उल्लिखित 'तदभिन्ने' शब्द की व्याख्या दो प्रकार से हो सकती हैं :—
१. तदभिन्ने—जाग्रत् इत्यादि भेदपूर्ण अवस्थायें उस मौलिक भेदरहित तत्त्व से भिन्न
नहीं हैं क्योंकि वह, अपनी इच्छा से, स्वरूप में ही ऐसे अवस्थाभेद उपजाता है ।
२. तदभिन्ने—जाग्रत इत्यादि अवस्थाओं में यद्यपि पारस्परिक भेद होता भी है परन्तु
उन सबों में वह तत्त्व एक ही भेदरहित वेदक के रूप में व्याप्त रहता है ।
प्रस्तुत प्रकरण में 'जाग्रदादि' शब्द से मुख्यरूप में जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और गौणरूप
में इन तीनों के अतिरिक्त स्मृति, भ्रान्ति, मद, मूर्च्छा इत्यादि सारी, जीवभाव के साथ सम्ब-
न्धित, अवस्थाओं का ग्रहण किया जाता है । वास्तव में शैव-सिद्धान्त के अनुसार जाग्रत् १,
स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्या और तुर्यातीत यही मुख्य पाँच अवस्थाएँ हैं परन्तु उनमें से अन्तिम दो
१. जाग्रत् स्वप्नः सुषुप्तं च तुर्यं च तदतीतकम् ।
इति पञ्च पदान्याहः .......................... ॥ ( तं०, १०.२२८ )