सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 794, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 794
  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७६५

मोक्ष देनेवाला है। प्रतिदिन अविच्छिन्नरूपसे वेदोंका पाठ, मन्त्रोंका जप, अग्निहोत्र, दान, अनेक प्रकारके यज्ञ, देवताओंकी उपासना, त्रिरात्र अथवा पंचरात्र आदि आगमोक्त विधिसे आराधना, सांख्य, योग और श्रीविष्णुकी आराधना—ये सभी श्रेष्ठ कर्म मोक्षके साधन बताये गये हैं। अयोध्या, मथुरा आदि पुरियाँ भी मरे हुए जीवोंको मोक्ष देनेवाली बतायी गयी हैं। ये सभी कैवल्य मोक्षके साधन हैं, इसमें सन्देह नहीं। अन्य तीर्थ काशीकी प्राप्ति कराते हैं और काशीको प्राप्त होकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। इसीलिये वह पवित्र क्षेत्र इस ब्रह्माण्डमण्डलमें भगवान् विश्वनाथको सदा प्रिय है। सुव्रत ! मैं तो काशीसे आनेवाली वायुका भी स्पर्श चाहता हूँ। तुम तो साक्षात् काशीमें रहकर आये हो। जो जितेन्द्रिय होकर तीन रात भी काशीमें निवास करते हैं, उनकी चरणधूलिका स्पर्श अवश्य ही पवित्र कर देता है। तुम तो वहाँके निवासी ही थे, अतः तुम्हारे लिये क्या कहना है।

यों कहकर कार्तिकेयजीने अगस्त्य मुनिके सब अंगोंका स्पर्श किया और ऐसा करके उन्होंने अमृतके सरोवरमें स्नान करनेका सुख पाया। तत्पश्चात् 'जय विश्वनाथ' ऐसा कहकर उन्होंने अपने दोनों नेत्र बंद कर लिये और एक क्षणतक भगवान् शिवके अनिर्वचनीय स्वरूपका ध्यान किया। ध्यानसे निवृत्त होनेपर उनसे अगस्त्यजीने पूछा—'स्वामिन् ! आप मुझसे काशीकी महिमा कहिये। वह क्षेत्र मुझे बहुत प्रिय है।'

स्कन्द बोले—अगस्त्यजी ! काशीक्षेत्र इस लोकमें अत्यन्त गोपनीय बताया गया है। वहाँ सब प्रकारकी सिद्धि सन्निकट है; क्योंकि उसमें साक्षात् परमेश्वर सदा निवास करते हैं। काशीक्षेत्र आकाशमें स्थित है। वह इस भूलोकसे संलग्न नहीं है, किंतु इस बातको केवल योगीजन देख पाते हैं, अयोगी नहीं। जो पलभर भी अविमुक्त क्षेत्रके प्रति अतिशय भक्ति-भाव धारण करता है, उसने मानो ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक बड़ी भारी तपस्या कर ली। उसके द्वारा शिवसम्बन्धी सम्पूर्ण दिव्य व्रतोंका पालन हो जाता है। जो एक वर्षतक काशीमें क्रोधको जीतकर इन्द्रियसंयमपूर्वक रहता है, दूसरेके धनसे अपने शरीरका पोषण न करके पराये अन्नका परित्याग करता है, परनिन्दासे बचता है और प्रतिदिन कुछ-न-कुछ दान करता रहता है, उसने पूर्वजन्ममें सहस्रों वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की है, ऐसा मानना चाहिये। जो काशीक्षेत्रके माहात्म्यको जाननेवाला मनुष्य जीवनभर काशीवास करता है, वह जन्म-मृत्युका भय छोड़कर परम गतिको प्राप्त होता है। जो मृत्यूपर्यन्त काशीका परित्याग नहीं करता, उसकी केवल ब्रह्महत्या ही नहीं दूर होती, अविद्या भी दूर हो जाती है। जो अनन्यचित्त होकर काशीक्षेत्रको नहीं छोड़ता, वह जरा-मृत्यु तथा गर्भवासके अत्यन्त दुःसह दुःखको त्याग देता है। जो बुद्धिमान् मानव इस पृथ्वीपर फिर जन्म लेना नहीं चाहता, वह देवताओं तथा ऋषियोंद्वारा सेवित काशीक्षेत्रका कभी त्याग न करे। अन्तकालमें वातसे पीड़ित हुए मनुष्यके मर्मस्थान जब विदीर्ण होने लगते हैं, उस समय वह अपनी सुध-बुध खो बैठता है। इसी समय साक्षात् भगवान् विश्वनाथ प्राणत्यागकालमें उपस्थित हो उस मुमूर्षु जीवको तारक मन्त्रका उपदेश देते हैं, जिससे वह शिवस्वरूप हो जाता है। अतः अतिशय पापोंसे भरे हुए इस मानव-शरीरको अनित्य जानकर मनुष्य संसारभयका नाश करनेवाले काशीक्षेत्रका सेवन करे। जो विघ्नोंसे आहत होनेपर भी काशीक्षेत्रका त्याग नहीं करता, वह मोक्ष-सम्पत्तिको पाकर ऐसी स्थितिमें पहुँच जाता है, जहाँ दुःखका सर्वथा अभाव है। अतः कौन ऐसा बुद्धिमान् पुरुष है, जो बड़े-बड़े पापपुंजका नाश तथा पुण्योंकी वृद्धि करनेवाली और अन्तमें भोग एवं मोक्ष देनेवाली काशीपुरीका सेवन न करेगा? अविमुक्त क्षेत्रके माहात्म्यका मैं केवल छः मुखोंसे किस प्रकार वर्णन कर सकता हूँ, जब कि शेषनाग सहस्र मुखोंसे भी उसका वर्णन करनेमें असमर्थ हैं।