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सर्वकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 763, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 763
७३४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करना चाहिये। समयपर ही अन्न आदि ओषधियोंमें फल लगते हैं, समयपर ही वृक्षोंमें फूल खिलते हैं और समयपर ही मेघगण पानी बरसाते हैं। इसलिये सन्ध्याके लिये उचित कालका उल्लंघन न करे १। जिसने समयपर भगवान् सूर्यको गायत्रीमन्त्रसे अभिमन्त्रित जलकी तीन अञ्जलियाँ प्रदान कीं, उसने क्या तीनों लोकोंका दान नहीं कर दिया? ठीक समयसे उपासना करनेपर भगवान् सूर्य मनुष्यको आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन, पशु, मित्र, पुत्र, स्त्री, भाँति-भाँतिके क्षेत्र, आठ प्रकारके भोग, स्वर्ग तथा मोक्ष क्या-क्या नहीं देते। सब मन्त्रोंमें प्रणवसहित गायत्री दुर्लभ है। तीनों वेदोंमें गायत्रीसे बढ़कर कोई मन्त्र नहीं बताया गया है। गायत्रीके समान मन्त्र, काशीके सदृश पुरी तथा भगवान् विश्वनाथके तुल्य शिवमूर्त्ति कहीं नहीं है। गायत्री वेदोंकी माता और ब्राह्मणोंकी जननी है। वह अपना गान करनेवाले उपासकका त्राण करती है, इसलिये 'गायत्री' कहलाती है २। गायत्री-मन्त्र और भगवान् सूर्य इन दोनोंमें वाच्य-वाचक सम्बन्ध है। साक्षात् भगवान् सूर्य वाच्य (अर्थरूप) हैं और मन्त्रोंमें श्रेष्ठ गायत्री वाचक है। गायत्रीके प्रभावसे ही जितेन्द्रिय विश्वामित्र क्षत्रिय होनेपर भी राजर्षिपदका परित्याग करके ब्रह्मर्षिपदको प्राप्त हुए। गायत्री ही परम विष्णु है, गायत्री ही परम शिव है, गायत्री ही परम ब्रह्मा है और गायत्री ही तीनों वेद है। ३ जो ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि आलस्य छोड़कर सूर्यदेवतासम्बन्धी वैदिक सूक्तोंद्वारा सदैव भगवान् सूर्यका उपस्थान करते और उन्हें मस्तक झुकाते हैं, वे साक्षात् सूर्यके ही समान हैं। सूर्यग्रहणके समय जो कुछ स्नान, दान, जप, होम तथा श्राद्ध आदि सत्कर्मोंका अनुष्ठान किया जाता है, वह सब भगवान् सूर्यके सामीप्यकी प्राप्तिमें सहायक होता है। १ हंस, २ भानु, ३ सहस्रांशु, ४ तपन, ५ तापन, ६ रवि, ७ विकर्तन, ८ विवस्वान्, ९ विश्वकर्मा, १० विभावसु, ११ विश्वरूप, १२ विश्वकर्ता, १३ मार्तण्ड, १४ मिहिर, १५ अंशुमान्, १६ आदित्य, १७ उष्णगु, १८ सूर्य, १९ अर्यमा, २० ब्रध्न, २१ दिवाकर, २२ द्वादशात्मा, २३ सप्तहय, २४ भास्कर, २५ अहस्कर, २६ खग, २७ सूर, २८ प्रभाकर, २९ श्रीमान्, ३० लोकचक्षु, ३१ ग्रहेश्वर, ३२ त्रिलोकेश, ३३ लोकसाक्षी, ३४ तमारि, ३५ शाश्वत, ३६ शुचि, ३७ गभस्तिहस्त, ३८ तीव्रांशु, ३९ तरणि, ४० सुमहोरणि, ४१ द्युमणि, ४२ हरिदश्व, ४३ अर्क, ४४ भानुमान्, ४५ भयनाशन, ४६ छन्दोश्व, ४७ वेदवेद्य,


गंगाधरान्धकरिपो हर नीलकण्ठ वैकुण्ठ कैटभरिपो कमठाब्जपाणे।
भूतेश खण्डपरशो मृड चण्डिकेश त्याज्या भटा य इति सन्ततमामन्ति॥
विष्णो नृसिंह मधुसूदन चक्रपाणे गौरीपते गिरिश शङ्कर चन्द्रचूड।
नारायणासुरनिबर्हणशार्ङ्गपाणे त्याज्या भटा य इति सन्ततमामन्ति॥
(स्क० पु०, का० पू० ८। १००-१०१)

१- उपलब्ध्व च सावित्रीं नोपतिष्ठेत यः पराम्। काले त्रिकालं सप्ताहात्स पतेन्नात्र संशयः॥
तावत्प्रातर्जपस्तिष्ठेद्यावदर्धोदितो रवेः। आसनस्थो जपेन्मौनौ प्रत्यगा तारकोदयात्॥
सादित्यां मध्यमां सन्ध्यां जपेदादित्यसम्मुखः। काललोपो न कर्तव्यस्ततः कालं प्रतीक्षयेत्॥
काले फलन्त्योषधयः काले पुष्पन्ति पादपाः। वर्षन्ति तोयदाः काले तस्मात्कालं न लङ्घयेत्॥
(स्क० पु०, का० पू० ९। ४१-४४)

२- दुर्लभा सर्वमन्त्रेषु गायत्री प्रणवान्विता। न गायत्र्याधिकं किञ्चित्त्रयीषु परिगीयते॥
न गायत्रीसमो मन्त्रो न काशीसदृशी पुरी। न विश्वेशसमं लिंगं सत्यं सत्यं पुनः पुनः॥
गायत्री वेदजननी गायत्री ब्राह्मणप्रसूः। गातारं त्रायते यस्माद्गायत्री तेन गीयते॥
(स्क० पु०, का० पू० ९। ५१-५३)

३- गायत्र्येव परो विष्णुर्गायत्र्येव परः शिवः। गायत्र्येव परो ब्रह्मा गायत्र्येव त्रयी ततः॥
(स्क० पु०, का० पू० ९। ५७)