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सर्वकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 699, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 699
६७०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

है। इसे मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले स्त्री-समुदाय, शूद्र और वर्णसंकर धारण कर सकते हैं। इस मन्त्रके लिये दीक्षा, होम, संस्कार, तर्पण, समय-शुद्धि तथा गुरुमुखसे उपदेश आदिकी आवश्यकता नहीं है। यह मन्त्र सदा पवित्र है*। 'शिव' यह दो अक्षरका मन्त्र ही बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेमें समर्थ है और उसमें 'नमः' पद जोड़ दिया गया, तब तो वह मोक्ष देनेवाला हो जाता है। जो गुरु निर्मल, शान्त, साधु, स्वल्पभाषी, काम-क्रोधसे रहित, सदाचारी और जितेन्द्रिय हों, उनके द्वारा दयापूर्वक दिया हुआ मन्त्र शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है। प्रयाग, पुष्कर, केदार, सेतुबन्ध, गोकर्ण और नैमिषारण्य—ये सब क्षेत्र मनुष्योंको शीघ्र ही सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं।

मथुरापुरीमें दाशार्ह नामसे विख्यात एक राजा हो गये हैं, जो यदुकुलमें श्रेष्ठ, बुद्धिमान्, अत्यन्त उत्साही और महान् बलवान् थे। वे शास्त्रोंके ज्ञाता, नीतियुक्त वचन बोलनेवाले, शूरवीर, धैर्यवान् तथा परम कान्तिमान् थे। अनेक शास्त्रोंके तात्पर्यको जाननेमें राजाने कुशलता प्राप्त की थी। वे उदार, रूपवान्, तरुण तथा शुभ लक्षणोंसे सुशोभित थे। उन्होंने काशिराजकी पुत्री कलावतीके साथ विवाह किया था। ब्याह करके घर आनेपर रात्रिमें पलंगपर बैठी हुई उस स्त्रीको राजाने अपने पास बुलाया। पतिके बुलानेपर भी वह उनके समीप नहीं आयी। तब राजा उसे बलपूर्वक अपनी शय्यापर ले आनेके लिये उठे। यह देख रानीने कहा—'महाराज! मैं कारणका ज्ञान रखनेवाली तथा व्रतमें तत्पर हूँ। मेरा स्पर्श न कीजिये। आप तो धर्म-अधर्मको जानते हैं। अतः मेरे ऊपर बलप्रयोग न कीजिये। पति-पत्नीमें प्रेमपूर्वक जो समागम होता है, वही एक-दूसरेकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। बलपूर्वक स्त्रियोंका सम्भोग करनेसे पुरुषोंको क्या प्रसन्नता होती है और कौन-सा सुख मिलता है? जो प्रेम न करती हो, रोगिणी हो, गर्भवती अथवा किसी व्रतका पालन करनेवाली हो, रजस्वला और रतिकी इच्छा न रखनेवाली हो, ऐसी स्त्रीके साथ पुरुषको बलपूर्वक समागमकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये।'

रानीके इस प्रकार कहनेपर भी राजा दाशार्हने उसकी बात नहीं मानी। रानीका शरीर तपाये हुए लोहेके पिण्डके समान तप रहा था। उसका स्पर्श करते ही सहसा राजाका अंग-अंग जलने लगा। उन्होंने भयसे विह्वल होकर अपने शरीरको जलानेवाली रानीको छोड़ दिया।

राजा बोले—प्रिये! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है कि पल्लवके समान कोमल यह तुम्हारा शरीर अग्निके समान तप्त कैसे हो गया।

रानीने उत्तर दिया—राजन्! बचपनमें मुनिवर दुर्वासाने मुझपर दया करके शिवजीके पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश किया था। उस मन्त्रके प्रभावसे मेरा शरीर निष्पाप हो गया है। पापी पुरुष इसका स्पर्श नहीं कर सकते। महाराज! आपने स्वभावसे ही मदिरा पीनेवाली कुलटा और वेश्याओंका सेवन किया है। आप पवित्र मन्त्रका जप और भगवान् शंकरकी आराधना भी नहीं करते। फिर मेरा स्पर्श कैसे कर सकते हैं?

राजा बोले—सुन्दरी! तुम मुझे भी भगवान् शंकरके शुभ पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश करो।

रानीने कहा—आप मेरे गुरु हैं, मैं आपको उपदेश नहीं कर सकती। आप मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गुरु गर्गाचार्यके समीप जाइये।


* तस्मात् सर्वप्रदो मन्त्रः सोऽयं पञ्चाक्षरः स्मृतः। स्त्रीभिः शूद्रैश्च संकीर्णैर्धार्यते मुक्तिकाङ्क्षिभिः॥
नास्य दीक्षा न होमश्च न संस्कारो न तर्पणम्। न कालो नोपदेशश्च सदा शुचिरयं मनुः॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १। २०, २१)