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सर्वकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 659, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 659

६३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करते और उस तीर्थमें रहनेवाले मनुष्यके सब पापोंको हर लेते हैं। द्वारकातीर्थ मोक्ष चाहनेवाले मनुष्योंको मुक्ति देनेवाला, धनार्थियोंको धन देनेवाला तथा आयु, सुख एवं सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करनेवाला है। जो मनुष्य वहाँ एकादशीमें उपवास करके श्राद्ध करता है, वह नरकोंसे सब पितरोंका उद्धार कर देता है।

वहाँ द्वारकाके समीप मार्कण्डेयजीसे उपलक्षित एक गोवत्स नामक तीर्थ है, जो पृथ्वीमें सर्वत्र विख्यात है। उस तीर्थमें जगत्पति उमाकान्त भगवान् शिव गायके बछड़ेके रूपमें अवतीर्ण हो स्वयम्भू लिंगरूपसे विराज रहे हैं। पूर्वकालमें बलाहक नामके एक शत्रुविजयी राजा थे, जो महान् बलवान् और भगवान् शिवके परम भक्त थे। एक दिन जब वे शिकार खेलनेमें लगे थे, उनके किसी पैदल सैनिकने मृगोंके झुण्डमें एक गायके बछड़ेको स्थित देखकर राजासे कहा— 'नृपश्रेष्ठ! मैंने मृगोंके समुदायमें एक गायका बछड़ा देखा है, जो उन्हींमें हिला-मिला है। उसकी माँ उसके साथ नहीं है।' राजाने उस नौकरसे कहा— 'तू मुझे उस बछड़ेको दिखा।' तब उस पैदल सेवकने वनमें जाकर राजाको वह बछड़ा दिखाया। उस समय पैदल सैनिकोंके भयसे मृगोंका वह झुण्ड पीलु वृक्षकी झाड़ीकी ओर भागा। तब गायका बछड़ा भी उसी ओर चला। राजा उसे पकड़नेके लिये झाड़ीमें घुस गये और ज्यों ही उसे पकड़ने लगे त्यों ही वह उज्ज्वल शिवलिंगके रूपमें परिणत हो गया। यह देखकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे— 'यह क्या बात है।' तबतक उस शिवलिंगके मध्य भागमें उन्होंने गायके बछड़ेको स्थित देखा। अब उनके मनमें यह निश्चय हो गया कि 'अवश्य ही गायके बछड़ेके रूपमें साक्षात् भगवान् महेश्वर विराजमान हैं।' तदनन्तर उन्हें ले जानेके लिये उद्यत हो राजाने उस शिवलिंगको उखाड़नेका प्रयत्न किया, किंतु वे उस देवलिंगको किसी प्रकार उठा न सके। तब राजाके साथ सब देवताओंने भगवान् शंकरसे प्रार्थना की।

देवता बोले— भगवन्! सर्वदेवेश्वर! प्रभो! आपको सब लोकोंका हित-साधन करनेकी इच्छासे शुक्ल लिंगरूपसे स्थित होना चाहिये।

श्रीमहादेवजीने कहा— देवताओ! मैं यहाँ सदा ही लिंगरूपसे स्थित रहूँगा। भाद्रपद मासके कृष्ण पक्षमें अमावास्याके दिन मेरा प्राकट्य हुआ है, इसलिये उस दिन विधिपूर्वक स्नान करके जो लोग इस शिवलिंगका पूजन करेंगे, उन्हें भय नहीं होगा। यहाँ पिण्डदान करनेसे पूर्वजोंको सदाके लिये उत्तम लोककी प्राप्ति होगी। घोर रौरव, कुम्भीपाक तथा अन्य अनेक नरकोंमें गिरे हुए अथवा पशु-पक्षियोंकी योनिमें पड़े हुए जो पितर हैं, उन्हें यहाँ एक बार पिण्डदान करनेसे अक्षय गतिकी प्राप्ति होती है।

तदनन्तर राजा बलाहकने सब देवताओंके समीप उस शिवलिंगको स्थापित किया और लोकहितकी कामनासे अनेक प्रकारके दान दिये। जबतक वे उस लिंगकी पूजा करते रहे, तभीतक साक्षात् भगवान् शिव भी वहाँ आ गये।

शिवजीने कहा— जो मनुष्य आजकी रातमें श्रद्धा और भक्तिसे इस देवेश्वर शिवकी पूजा करेंगे, उन्हें अक्षय पुण्यकी प्राप्ति होगी। जो गीता-शास्त्रका पाठ करते हुए जागरण करेंगे, वे मनुष्य अपनी एक सौ एक पीढ़ियोंका उद्धार कर देंगे।

यह देवाधिदेव भगवान् शिवका अद्भुत लिंग है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका माहात्म्य सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। गोवत्स नामसे विख्यात शिवलिंग मनुष्योंको परम पुण्य प्रदान करनेवाला है। वह अनेक जन्मोंके पापोंका नाश कर देता है, ऐसा मार्कण्डेयजीका वचन है। जिनका चित्त पापसे दूषित है, उनके पापयुक्त