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सर्वकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 210
  • माहेष्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १८१
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६५ असंग (अनासक्त), ६६ बहुज्ञ, ६७ वचसां पति (वाणीके अधिपति), ६८ विश्वपूज्य, ६९ मृत्युहारी, ७० घृणी (दयालु), ७१ धर्मकारण, ७२ प्रणतार्तिहर (शरणागतोंका कष्ट हर लेनेवाले), ७३ अरोग (रोगरहित), ७४ आयुष्मान्, ७५ सुखद, ७६ सुखी, ७७ मंगल, ७८ पुण्डरीकाक्ष (कमलके समान नेत्रोंवाले), ७९ व्रती (व्रतोंका पालन करनेवाले), ८० व्रतफलप्रद (व्रतोंका फल देनेवाले), ८१ शुचि (पवित्र), ८२ पूर्ण, ८३ मोक्ष-मार्ग, ८४ दाता, ८५ भोक्ता, ८६ धन्वन्तरि, ८७ प्रियाभास (जिनका प्रकाश लोकप्रिय है), ८८ धनुर्वेदवित् (धनुर्वेदके ज्ञाता), ८९ एकराट् (आकाशमें एकमात्र प्रकाशित होनेवाले), ९० जगत्पिता, ९१ धूमकेतु (अग्निरूप), ९२ विद्युत् (विशेष दीप्तिमान्), ९३ ध्वान्तहा (अन्धकारनाशक), ९४ गुरु, ९५ गोपति (किरणोंके स्वामी), ९६ कृतातिथ्य (सब लोग अर्घ्य देकर जिनका आतिथ्यसत्कार करते हैं), ९७ शुभाचार (पुण्यकर्मोंके प्रवर्तक), ९८ शुचिप्रिय (पवित्र आचार-विचारवाले जिन्हें अधिक प्रिय हैं), ९९ सामप्रिय (साम-गानके प्रेमी), १०० लोकबन्धु, १०१ नैकरूप (अनेक रूपवाले), १०२ युगादिकृत (युगादिके उत्पादक), १०३ धर्मसेतु (धर्म-मर्यादाके रक्षक), १०४ लोक-साक्षी (सब लोगोंके शुभाशुभ कर्मोंको देखनेवाले), १०५ खेट (आकाशमें विचरनेवाले), १०६ अर्क (अर्चनीय), १०७ सर्वद (सब कुछ देनेवाले) तथा १०८ प्रभु (सर्वशक्तिमान्) हैं। मेरे द्वारा इस प्रकार एक सौ आठ नामोंसे जिनकी भलीभाँति स्तुति की गयी है, वे सर्वलोकप्रिय भगवान् सूर्य समस्त लोकोंपर प्रसन्न हों।

इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने मुझसे कहा—देवर्षे! तुम्हारा प्रिय करनेकी इच्छासे मैं अपनी एक कलाद्वारा सदा इस स्थानमें निवास करूँगा। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक यहाँ मुझ भट्‍टादित्यकी पूजा करेगा, वह कामरूपधारी साक्षात् मुझ सहस्रांशुके पूजनसे प्राप्त होनेवाले फलको पा लेगा। जो मनुष्य मेरे उद्देश्यसे यहाँ थोड़ा या अधिक दान करेगा, उसे मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा और उसका पुण्य अक्षय होगा। जो मानव रविवारको अथवा षष्ठी या सप्तमी तिथिको लाल कमल, कल्हार, केशर, कनेर तथा सौ पत्तोंवाले महाकमलके पुष्पोंसे यहाँ मेरी पूजा करेंगे, वे जिन-जिन कामनाओंके लिये प्रार्थना करेंगे, उन सबको निश्चय ही प्राप्त कर लेंगे। भक्तिपूर्वक मेरा दर्शन करनेसे रोग और दरिद्रताका नाश होगा। प्रतिदिन मुझे प्रणाम करनेसे स्वर्गकी तथा नित्य प्रति मेरी स्तुति करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होगी।


## महात्मा नन्दभद्रके सारभूत विचार तथा उनके द्वारा सत्यव्रतके नास्तिकतापूर्ण विचारोंका खण्डन

**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! अब बहूदक स्थानकी एक अद्भुत कथा सुनो। कामरूपमें जो बहूदक नामक कुण्ड है, वह इस तीर्थमें आकर भलीभाँति प्रकट हुआ है। इसीलिये इसे बहूदक कहा गया है। महात्मा कपिलने बहुत वर्षोंतक तपस्या करके यहाँ एक बहुत सुन्दर शिवलिंगकी स्थापना की है, जो कपिलेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है। अर्जुन! नन्दभद्र नामके एक वणिक् थे, जो तीनों समय बड़े आदरके साथ कपिलेश्वर लिंगकी पूजा किया करते थे। वे साक्षात् दूसरे धर्मराजकी भाँति समस्त धर्मोंके विशेषज्ञ थे। धर्मोंके विषयमें जो कुछ कहा गया है, उसमें कोई भी ऐसी बात नहीं थी, जो नन्दभद्रको ज्ञात न हो। वे सबके सुहृद् थे और सदा सभीके हितसाधनमें संलग्न