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सर्वकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1329, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1329

१३०० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

संवर्तेश्वर, बलभद्रेश्वर, दशाश्वमेधिक तीर्थ, शतमेधादि लिंग तथा दुर्वासादित्यका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! इन्द्रेश्वरसे पश्चिम और अर्कस्थलसे पूर्व संवर्तेश्वर लिंग है। पुष्करिणीके जलमें स्नान करके उनका दर्शन करनेसे मनुष्य दस अश्वमेध यज्ञोंका फल पाता है। उसके पूर्वभागमें और पापमोचन तीर्थसे नैर्ऋत्यकोणमें मेघेश्वर नामसे विख्यात शिवलिंग है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। अनावृष्टिका भय होनेपर वहीं वारुणी शान्ति करानी चाहिये तथा वहाँकी पृथ्वीको जलमें डुबाये। जहाँ प्रतिदिन मेघोंद्वारा स्थापित मेघेश्वर लिंगका पूजन होता है, वहाँ अनावृष्टिका भय नहीं होता।

गात्रोत्सर्ग तीर्थसे उत्तर बलभद्रजीके द्वारा स्थापित महापापहारी शिवलिंग है। जो मानव तृतीया और रेवती नक्षत्रके योगमें भक्तिभावसे चन्दन, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा बलभद्रेश्वर लिंगका पूजन करता है, वह योगीश्वरका पद पाता है।

प्राचीन कालमें राजा भरतने पुण्यमय प्रभासक्षेत्रमें आकर परम उत्तम दस अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। उसमें सोमपान करके सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्र पूर्ण तृप्त हुए थे। अन्न और पानसे दीनजन तथा दक्षिणासे ब्राह्मणलोग तृप्त हुए थे। तदनन्तर सब देवता प्रसन्न होकर राजा भरतसे बोले—'महाबाहो! तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।'

राजा बोले—जो मनुष्य यहाँ आकर भक्ति-पूर्वक स्नान करे, उसे दस अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त हो।

देवताओंने कहा—राजन्! भूतपर यह स्थान दशाश्वमेधिक नामसे विख्यात होगा।

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! तबसे सब पापोंका नाश करनेवाला वह तीर्थ पृथ्वीपर दशाश्वमेधिक नामसे विख्यात हुआ। ऐन्द्रवारुण स्थानसे लेकर गोमुखतक और गोमुखसे आश्वमेधिक तीर्थतक विद्वानोंने शिवक्षेत्र बताया है। वहाँ मृत्युको प्राप्त होनेपर मनुष्य शिवलोकमें आनन्दित होता है।

वहीं शतमेध, सहस्रमेध और कोटिमेध नामके क्रमशः तीन लिंग हैं। दक्षिण दिशामें शतमेध लिंग है, जो सौ यज्ञोंका फल देनेवाला है। प्राचीन कालमें कार्तवीर्यने वहीं शिवलिंगकी स्थापना करके सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। मध्यमें जो कोटिमेध लिंग है, वहाँ साक्षात् ब्रह्माजीने ही महालिंगकी स्थापना करके एक करोड़ यज्ञ किये थे। उसके उत्तर भागमें सहस्रमेध लिंग है, जिसकी स्थापना करके देवराज इन्द्रने सहस्र यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। जो पंचामृत रस, जल, गन्ध और पुष्प आदिद्वारा विधिसे उस लिंगत्रयकी पूजा करता है, वह उन तीनों शिवलिंगोंके नामवाले यज्ञोंका फल पाता है।

वहीं दुर्वासादित्यका स्थान है, जहाँ मुनिवर दुर्वासाने हजार वर्षोंतक तप किया और निराहार रहकर सूर्यनारायणकी आराधना की थी। तब भगवान् सूर्यने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'सुव्रत! वर माँगो।' दुर्वासाजी बोले—'भगवन्! यहाँ मेरे द्वारा आपकी जो सुन्दर प्रतिमा स्थापित की गयी है, उसमें आप तबतक निवास करें, जबतक यह पृथ्वी स्थिर है। आपकी पुत्री यमुनाजी भी यहाँ रहें और आपके महाबली पुत्र धर्मराजजी भी यहाँ निवास करें।'

सूर्यदेवने कहा—महामुने! तुमने जो कुछ माँगा है, वह तो होगा ही; उसके सिवा गंगा आदि कोटि तीर्थोंका और भी यहाँ निवास होगा। देवताओंसहित मैं सदा यहाँ स्थित रहूँगा। दुर्वासादित्यका दर्शन करनेसे यहाँ सब प्राणी कोटि यज्ञोंका फल पायेंगे।

यों कहकर भगवान् सूर्यने अपनी कन्या और पुत्रका स्मरण किया। यमुनाजी पाताल फोड़कर