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सर्वकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1289, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1289
१२६०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कोई मन्त्रजप करता है तो उसे एक-एक जपका कोटि-कोटिगुना फल मिलता है।

सन्निहिताके दक्षिण तटपर पाण्डवेश्वरलिंग है, जिसकी स्थापना पाँचों पाण्डवोंने की है। वनवासी पाण्डव जब अज्ञातवासमें थे, तब तीर्थयात्राके प्रसंगसे प्रभासक्षेत्रमें आये। उस समय चन्द्रग्रहणका पर्व था। उसी अवसरपर उन सबने सन्निहिताके किनारे पाण्डवेश्वरकी स्थापना की। मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको ऋत्विज् बनाकर उन्होंने वैदिक मन्त्रोंसे मुझ शिवका अभिषेक कराया। ऋषियोंने उस लिंगका माहात्म्य बताते हुए कहा—'जो लोग इस पाण्डव-पूजित लिंगकी अर्चना करेंगे, वे देवता, दानव तथा राक्षसोंके लिये भी पूजनीय होंगे। श्रद्धापूर्वक इसका पूजन करनेसे उन्हें अश्वमेध यज्ञका फल होगा। जो पूरे माघभर सन्निहिता कुण्डमें नहाकर पाण्डवेश्वरकी पूजा करता है, वह साक्षात् पुरुषोत्तम होता है। इस लिंगके दर्शनसे भी पापके सहस्रों टुकड़े हो जाते हैं।'

पार्वती! इस प्रकार श्रद्धापूर्वक यात्रा करके मनुष्य प्रभासक्षेत्रके ग्यारह रुद्रोंके समीप जाय। मनुष्योंसे जो ग्यारह इन्द्रियोंद्वारा ग्यारह प्रकारके पाप बन जाते हैं, उन सबका यहाँ ग्यारह रुद्रोंके पूजनसे नाश हो जाता है। संक्रान्ति, अयन, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा अन्यान्य पुण्य तिथियोंमें भक्तिभावसे क्रमशः ग्यारह रुद्रोंका पूजन करना चाहिये। कलिमें इन ग्यारह रुद्रोंके नाम इस प्रकार हैं— भूतेश, नीलरुद्र, कपाली, वृषवाहन, त्र्यम्बक, घोरनामा, महाकाल, भैरव, मृत्युंजय, कामेश और योगेश। पार्वती! ये जो ग्यारह रुद्र बताये गये हैं, इनका रहस्य सुनो। इनमें दस तो दस प्राणवायु हैं और एक आत्मा है। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय—ये ही दस प्राणवायु कहे गये हैं।

रुद्रोंमें आदिदेव सोमेश्वर भी हैं, उनकी भूतेश्वर नामसे विधिवत् पूजा करनी चाहिये। उन्हें पंचामृतसे स्नान कराकर 'सद्योजात' मन्त्रसे मनोहर पुष्पोंद्वारा पूजन करना चाहिये। भक्तिपूर्वक सदाशिवका ध्यान करते हुए तीन बार प्रदक्षिणा और साष्टांग प्रणाम करे। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त जो पचीस भूतगण बताये गये हैं, उन सबके ईश्वर होनेसे इन शिवको 'भूतेश्वर' कहते हैं। भूतेश्वरका पूजन करके मनुष्य अविनाशी मोक्षको प्राप्त होता है।

भूतेश्वरसे उत्तरभागमें सोलह धनुषपर द्वितीय रुद्र नीलरुद्रके नामसे प्रसिद्ध हैं। उनको विधिपूर्वक स्नान कराकर ईश-मन्त्रद्वारा पूजा करे। कुमुद, उत्पल और कह्लार (लाल कमल) चढ़ाये। प्रदक्षिणा और नमस्कार करे। यों करनेसे मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है। पूर्वकालमें नीले अंजनके समान रंगवाला अन्धकासुर उनके द्वारा मारा गया था, इसलिये वे नीलरुद्र कहलाये।

नीलरुद्रसे पूर्व और बुधेश्वरसे पश्चिम सात धनुष दूर कपालेश्वर विराजमान हैं। 'तत्पुरुष' मन्त्रद्वारा उनकी पूजा करे। उनके दर्शनसे जन्मभरका पाप नष्ट हो जाता है।

बालरूपधारी ब्रह्माजीसे उत्तर तीन धनुषपर वृषभेश्वर नामक चौथे रुद्र हैं। वे आदिलिंग हैं। पुण्यहीन मनुष्य उनको नहीं जानता। जो उन वृषभवाहन शिवका पूजन करता है, वह सात जन्मोंके पातकोंसे मुक्त हो जाता है। उनके चारों ओर तीस-तीस धनुषतक उन्हींका क्षेत्र है। जो उस तीर्थमें स्नान, जप, बलि, होम, पूजा, स्तोत्रपाठ आदि करता है, उसका वह सब कर्म अक्षय हो जाता है। जो एक रात उपवास करके ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक वृषभेश्वरदेवके समीप जागरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो वहाँ भाँति-भाँतिके भोज्य पदार्थोंसे ब्राह्मणोंको तृप्त करता है, उसे एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर कोटि ब्राह्मणोंके भोजन करानेका फल होता है। भैरव, केदार, पुष्कर, कुरुजांगल, कुरुक्षेत्र, काशी, महाकाल और नैमिष—ये आठ तीर्थ वृषभेश्वरलिंगमें प्रतिष्ठित हैं। जो माघकृष्णा चतुर्दशीकी रात्रिमें वहाँ जागता है, वह विधिपूर्वक उस लिंगकी