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सर्वकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1266, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1266

* प्रभासखण्ड * । १२३७


सोमनाथजीकी सुवर्णमयी प्रतिमा मनोमती नामक शक्तिके सहित स्वर्ण-शय्यापर स्थापित करनी चाहिये। सुवर्ण अथवा रजत आदिके पात्रको शहदसे भरकर उसे स्वर्ण शय्यापर आच्छादित करके रख दे और उसीपर शिव-प्रतिमाका पूजन करे। फिर वस्त्र, आभूषण, ताम्बूल, छत्र, चवँर, दर्पण, दीप, घण्टा, चाँदोवा, शय्या और गद्दा आदि वस्तुएँ सोमनाथकी प्रीतिके उद्देश्यसे पुराणवेत्ता आचार्यको दान करे। वहीं होम कराये। पूजन करके रातमें वहीं जागरण करे। अपने हृदयमें सोमनाथजीका ध्यान करते हुए पंचगव्य पीकर रहे। प्रातःकाल स्नान करके विधिपूर्वक सोमदेवका ध्यान करे। तत्पश्चात् दूध और खाँड़ आदिसे बने हुए अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंद्वारा नौ ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराये। दो वस्त्र और एक गोदान करके विसर्जन करे। इस प्रकार सोमवारव्रतका पालन करनेवाला पुरुष अक्षय पुण्यका भागी होता है। धन-धान्यसे सम्पन्न तथा स्त्री-पुत्र आदिसे सुशोभित होता है। उसके कुलमें कोई दरिद्र अथवा दुःखी नहीं होता। इस प्रकार विधिपूर्वक व्रत करनेपर मनुष्य देहत्यागके पश्चात् शिवलोकमें जाता है। महाभाग ! जहाँ भगवान् सोमनाथ विराजमान हैं, वहाँ शीघ्र जाओ।

महादेवजी कहते हैं—गोशृंग मुनिके यों कहनेपर गन्धर्वराज धनवाहन अपनी पुत्रीके साथ सब उपहार लेकर प्रभासक्षेत्रमें आये। वे सोमनाथका दर्शन करके आनन्दमें मग्न हो गये। यात्राके क्रमसे सोमनाथजीका पूजन करके उन्होंने कन्यासहित सोमवारव्रत किया। इससे उनके ऊपर सोमनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने उनकी कन्याके रोगोंका नाश करके समस्त कामनाओंकी सिद्धि देनेवाला गन्धर्वदेशका राज्य तथा अपनी भक्ति दी।

महादेवजीसे वरदान पाकर धनवाहन गन्धर्व कृतार्थ हो गये। उन्होंने सोमनाथजीके उत्तर भागमें दण्डपाणिके समीप भक्तिपूर्वक गन्धर्वेश्वर शिवकी स्थापना की। ये वरदासे पश्चिम पाँच धनुषकी दूरीपर स्थित हैं। पंचमी तिथिमें उनकी पूजा करके मनुष्य कभी दुःखी नहीं होता। धनवाहनकी पुत्री गन्धर्वसेनाने भी वहीं गौरीजीके समीप पूर्वभागमें तीन धनुषकी दूरीपर विमलेश्वर नामक शिवलिंगकी प्रतिष्ठा की, जो सब रोगोंका नाश करनेवाला है। तृतीयाको विमलेश्वरकी पूजा करके प्रत्येक स्त्री दुर्भाग्य-दोषसे मुक्त हो जाती, घरमें सम्मानित होती तथा पुत्र एवं संपूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेती है।


सोमनाथकी यात्राविधि

**पार्वती बोलीं—**देव ! अब आप सोमनाथजीकी महिमाका यथावत् वर्णन करें।

**महादेवजीने कहा—**भामिनि ! हेमन्त, शिशिर एवं वसन्त-ऋतुओंमें सोमनाथकी यात्रा करनी चाहिये। अथवा जब कभी भी आपके पास धन हो, मनमें यात्राके लिये उत्साह हो एवं कोई पर्व आया हो, तभी वहाँ यात्रा की जा सकती है। श्रद्धा-भक्ति ही यात्राका मुख्य हेतु है। अपने घरमें कोई नियम लेकर मन-ही-मन भगवान् शिवको प्रणाम करे। फिर विधिपूर्वक श्राद्ध करके अपने ग्रामकी परिक्रमा करे। तत्पश्चात् मौन एवं एकाग्रचित्त हो मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए यात्राके लिये निकले। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मात्सर्य और चपलताका त्याग करके मनुष्योंको वहाँकी यात्रा करनी चाहिये। तीर्थयात्रामें यज्ञोंसे भी बढ़कर पुण्य होता है। महादेवि ! सोमनाथजीकी यात्राके सिवा दूसरे किसी उपायद्वारा सुगमतासे स्वर्गलोककी प्राप्ति नहीं होती। जो मनुष्य पवित्र श्रद्धाभावसे युक्त हो सोमेश्वरकी यात्रा करते हैं, वे मनुष्य कलियुगमें धन्य हैं। जैसे