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सर्वकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1249, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1249

१२२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भावभक्तिसे जानने योग्य, परम सूक्ष्म, पचीस तत्त्वोंकी उत्पत्तिका कारण, अप्रमेय, अनन्त, अक्षय, इच्छानुसार रूपधारी, सब प्राणियोंकी उत्पत्तिका कारण, बीज और अंकुरको भी प्रकट करनेवाला, व्यापक, सर्वकाम, अक्षर (नाशरहित), परमपद, स्थूल और सूक्ष्म सभी विभागोंमें स्थित, व्यक्ताव्यक्तस्वरूप, सनातन, कल्प-कल्पान्तरहित, अनादि, अनन्त, महाभूत, महाकाम, शिव तथा निर्वाणभैरव समझो। इतना ही नहीं, उन्हें योगक्रियासे मुक्त, मृत्युंजय, अनादिमान्, समस्त उपसर्गोंसे रहित, सर्वव्यापी, शिव, परम अकल, द्वैतवर्जित, अन्य तेजसे रहित, प्रभासक्षेत्रनिवासी, सूर्यके समान अधिक कान्तिमान्, सम्पूर्ण तेजोंसे अधिक बढ़े हुए, शरणागतवत्सल, ईशान, देव, ॐकार, शिवरूपी, देवदेव, महादेव, पंचमुख, वृषध्वज, निर्मल, मनके अगोचर, भावग्राह्य, उपमारहित, सदा शान्त, विरूपाक्ष, शूलहस्त, जटाधर, हृदयकमलके मध्यकोषमें विराजमान, शून्यरूप तथा निरंजन जानो। जो परात्पर देव 'हंस' और 'नाद' कहे गये हैं, वे ही इस प्रभास-स्थानमें स्वयं विराजमान हैं।

देवि! अपने इस आदिस্বরূপको मैंने योगबलसे जाना है और स्वयं ही इसका निरूपण किया है। ये सोमनाथ पूर्वाह्नकालमें ऋग्वेदमें स्थित होते हैं, मध्याह्नमें यजुर्वेदके भीतर इनकी स्थिति होती है, अपराह्नकालमें सामवेदमें और सन्ध्याके समय अथर्ववेदमें ये विराजमान होते हैं। मैं अन्धकारसे परे, सूर्यके समान प्रकाशमान इस अन्तर्यामी महापुरुष सोमेश्वरको जानता हूँ। इनको ही जानकर मनुष्य कभी मृत्युको नहीं प्राप्त होता (मुक्त हो जाता है)। मनुष्योंकी मुक्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं है। पार्वती! इस प्रकार महामहिमाशाली सोमनाथके माहात्म्यका दिग्दर्शन-मात्र कराया गया है।

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सोमनाथके आठ नाम और पार्वतीके अठारह नामोंका वर्णन, सोमनाथ नामका हेतु तथा सोमेश्वरकी महिमा

सूतजी कहते हैं— महर्षियो! महादेवी पार्वती ने इस प्रकार प्रभासकी महिमा सुनकर पुनः भगवान् शंकरसे पूछा—'देवदेव! जगन्नाथ! भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले! सम्पूर्ण ज्ञानसे सम्पन्न! सुरेश्वर! आपको नमस्कार है। प्रभो! इस दिव्य लिंगका 'सोमेश्वर' नाम किस समय हुआ?'

महादेवजीने कहा— पूर्वकालमें मैं ही स्पर्शलिंग-स्वरूपसे विद्यमान था। उस समय कोई भी मनुष्य यहाँ मुझे नहीं जानता था। जब प्रलयके बाद महाकल्पका प्रारम्भ होता है और ब्रह्माका भी लय होकर नूतन ब्रह्माकी सृष्टि होती है। उस समय मेरे इस दिव्य लिंगका नाम भी बदलकर दूसरा हो जाता है। अबतक छः ब्रह्मा बदल गये हैं और अब ये सातवें ब्रह्मा चल रहे हैं। इस समय जो प्रजापति ब्रह्मा हैं, इनका नाम 'शतानन्द' है। देवेश्वरि! ये ब्रह्मा जब आठ वर्षके हुए, तबसे लेकर मेरे इस लिंगका नाम सोमनाथ प्रसिद्ध हुआ है। बीते हुए कल्पोंमें जो पहले ब्रह्मा थे, उनका नाम 'विरिंचि' था। उनके समयमें इन सोमनाथका नाम 'मृत्युंजय' था। तत्पश्चात् दूसरे कल्पमें जो दूसरे ब्रह्मा हुए, वे 'पद्मभू' नामसे विख्यात हुए। देवि! उनके समयमें मेरे इस लिंगका नाम 'कालाग्निरुद्र' हुआ। तीसरे ब्रह्माकी प्रसिद्धि 'स्वयम्भू' नामसे हुई है। उस समय सोमनाथका नाम 'अमृतेश' था। चौथे ब्रह्मा 'परमेष्ठी' नामसे विख्यात हुए; उस समय उनका नाम 'अनामय' था। पाँचवें ब्रह्मा 'सुरज्येष्ठ' नामसे विख्यात हुए। उस समय

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