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सर्वकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1179, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1179

१९५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

गुफामें छिपा है, कुछ भी नहीं बोले। मौनव्रतमें ही तत्पर रहे। बार-बार पूछे जानेपर भी जब मुनि कुछ नहीं बोले, तब सबने आपसमें सलाह करके यह निश्चय किया कि अवश्य यही चोर है। हमलोगोंको अपने पीछे लगा देखकर अब साधु बनकर बैठ गया है। वे सब-के-सब दुरात्मा आभीर थे, उन्होंने पूर्वोक्त निश्चय करनेके बाद फिर कुछ विचार नहीं किया। मुनिको तत्काल ले जाकर वनके भीतर शूलीपर चढ़ा दिया। इस प्रकार माण्डव्य मुनिको निर्दोष होते हुए भी अपने पूर्वकर्मके परिणामसे शूली प्राप्त हुई।

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अन्न और जलके दानकी महत्ता, अन्नदानके बिना वसुषेणको स्वर्गमें भी कष्ट होना तथा सत्यसेनद्वारा स्थापित मिष्टान्नद देवकी महिमा

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! प्राचीन कालमें आनर्तदेशमें वसुषेण नामवाले एक राजा राज्य करते थे। वे दीर्घकालतक राज्य कर पुत्र-पौत्रका सुख देख करके समय आनेपर मृत्युको प्राप्त हुए। तदनन्तर मन्त्रियोंने उनके पुत्र सत्यसेनको राजपदर अभिषिक्त किया। सत्यसेन शौर्य तथा उदारतासे सम्पन्न थे। राजा वसुषेणने जीवनकालमें बहुत-से दान किये थे। उस दानके ही प्रभावसे वे दिव्य वस्त्रधारी एवं दिव्यरत्नोंसे विभूषित हो श्रेष्ठ विमानपर बैठकर स्वर्गलोकमें गये। पर वहाँ जानेपर भी वे भूखकी पीड़ासे घिरे रहे। उनका चित्त प्यासके दुःखसे व्याकुल रहता था, मुँह सूखा जाता था। उन्होंने इन्द्रके निकट जाकर कहा—'सुरश्रेष्ठ! मुझे भूख-प्यास कष्ट दे रही है, इसका क्या कारण है? बताइये। शचीपते! भूखसे अत्यन्त पीड़ित रहनेवाले पुरुषको इन दिव्य आभूषणों, वस्त्रों और विमान आदिसे क्या सुख मिलता है।'

इन्द्र बोले—राजन्! तुमने असंख्य दान दिये हैं, परंतु कभी किसीको अन्न अथवा जल नहीं दिया है। इस कारण तुम स्वर्गमें भूखे-प्यासे रहते हो। जो इस लोक और परलोकमें सनातन तृप्तिकी इच्छा रखता हो, उसे सदा दक्षिणासहित अन्न और जलका दान करना चाहिये। अन्न और जलका दान न करनेके कारण ही तुम स्वर्गमें दिव्य आभूषणोंसे विभूषित और श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ होकर भी भूखसे पीड़ित हो।

राजाने कहा—देवराज! क्या ऐसा कोई उपाय है, जिससे ये मेरी तीव्रतम क्षुधा-पिपासा शान्त हो?

इन्द्र बोले—उपाय तो है, यदि तुम्हारा कोई पुत्र सदा ब्राह्मणोंके लिये अन्न और जल दे, तो तुम्हें तृप्ति प्राप्त हो सकती है; परंतु तुम्हारा पुत्र भी तुम्हारे लिये संकल्प करके ब्राह्मणोंको अन्न और जल नहीं देता है।

इन्द्र और वसुषेणमें यह बात हो ही रही थी कि वहाँ ब्रह्मलोकसे नारद मुनि आ पहुँचे। तब इन्द्रने नारदजीको विधिपूर्वक अर्घ्य प्रदान करके आदरके साथ पूछा—'विप्रवर! आप कहाँसे आये हैं और कहाँ जानेके लिये प्रस्थित हुए हैं।'

नारदजीने कहा—मैं ब्रह्मलोकसे आया हूँ और तीर्थयात्राके लिये भूतलपर जा रहा हूँ।

तब राजा बोले—मुनिश्रेष्ठ! मुझ दीनपर कृपा कीजिये। पृथ्वीपर मेरा पुत्र सत्यसेन आनर्त देशका स्वामी है। उससे कहियेगा, 'मैंने तुम्हारे पिताको इन्द्रके लोकमें देखा है, उनका शरीर भूख-प्याससे पीड़ित है और देवताओंमें रहकर भी उनका चित्त अत्यन्त दीन एवं दुःखी है। इसलिये यदि तुम मेरे पुत्र हो और सत्यकी रक्षा करते हो, तो प्रतिदिन ब्राह्मणोंको मिष्टान्न, धान और जलदान करते रहो।'

'तथास्तु' कहकर मुनिश्रेष्ठ नारदजीने राजाका सन्देश सुनानेकी प्रतिज्ञा की और इन्द्रसे विदा लेकर वे भूलोककी ओर चल पड़े। वहाँ क्रमशः अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए आनर्तदेशमें गये