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सर्वकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1161, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1161

१९३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


इस प्रकार चौंसठ गोत्रोंके श्रेष्ठ ब्राह्मण महात्मा त्रिजातद्वारा वहाँ लाये गये। वे सब मिलकर लगभग पंद्रह सौ ब्राह्मण एकत्र हुए थे। सभी वहाँ समान भागके उपभोक्ता हुए। सबकी समान स्थिति मानी गयी। क्रमशः सबका वंश बढ़ने लगा और उनके सहस्रों पुत्र, पौत्र, नप्ता, दौहित्र तथा भागिनेयोंसे पुनः सारा नगर भर गया। जो मनुष्य सदा भक्तिभावसे इस चरित्रका पाठ करता है, इस पृथ्वीपर उसकी सन्तानका कभी नाश नहीं होता।


रैवत और क्षेमंकरीद्वारा रैवतेश्वर तथा कात्यायनीकी स्थापना

सूतजी कहते हैं—महर्षियो ! पूर्वकालमें तक्षक नाग सौराष्ट्र देशके राजाके यहाँ पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ। वहाँ उसका नाम रैवत था। उन्हीं दिनों आनर्तदेशमें राजा प्रभंजन राज्य करते थे। उनका बहुत-से राजाओंके साथ वैर बँध गया था। इसलिये शत्रु उनका देश उजाड़ते और पशुओंको बलपूर्वक हर ले जाते थे। अतः उन शत्रुओंके साथ उनका सदैव युद्ध होता रहता था। उसी समय उनकी धर्मपत्नी प्रियंवदाने ऋतुस्नाता होकर गर्भधारण किया। समयानुसार कमलके समान नेत्रोंवाली एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई, जिसने रातके अन्धकारमें भी अपनी अंगकान्तिसे सूतिकागृहको प्रकाशित कर दिया था। राजा प्रभंजनने पुत्रकी ही भाँति उस कन्याके जन्मका उत्सव मनाया। सब ओर गीत और वाद्योंकी मधुर ध्वनि छा रही थी। तेरहवें दिन भूपालने ब्राह्मणोंके आगे कन्याका नामकरण-संस्कार किया। उसका नाम क्षेमंकरी हुआ। वह 'यथा नाम तथा गुण' थी। धीरे-धीरे जब कन्या बड़ी हुई, तब वैवाहिक शुभ लग्नमें राजाने सौराष्ट्रनाथ रैवतके साथ उसका विवाह कर दिया। उन दोनों नवदम्पतिसे रेवती नामवाली एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका विवाह बलरामरूपमें अवतीर्ण हुए नागराज शेषके साथ हुआ था। राजा रैवत और क्षेमंकरीसे प्रौढ़ा अवस्था आ जानेपर भी कोई वंशप्रवर्तक पुत्र नहीं हुआ। इसके कारण उन दोनोंके मनमें बड़ा दुःख था। वे अपना सारा राज्य मन्त्रियोंको सौंपकर पुत्रके लिये तप करनेके उद्देश्यसे तपोभूमिमें चले गये। वहाँ विन्ध्याचल पर्वतपर अपने लिये आश्रम बनाकर दोनों एकाग्रचित्तसे रहने लगे और कात्यायनी देवीकी स्थापना करके उनकी आराधनामें संलग्न हो गये। कात्यायनी देवी वही हैं, जिन्होंने कौमार-व्रत धारण करके महिषासुरका वध किया था। देवीने उन दोनोंकी आराधनासे सन्तुष्ट होकर उन्हें एक वंशवर्द्धक पुत्र प्रदान किया, जो क्षेमजितके नामसे प्रसिद्ध हुआ। पुत्र पाकर सौराष्ट्रराज रैवत अपनी राजधानीको लौट आये और उन्होंने बड़े हर्षके साथ उसका लालन-पालन किया। क्षेमजित जब युवावस्थाको प्राप्त हुआ, तब राजाने उसे अपने स्थानपर अभिषिक्त किया और स्वयं वे सब कुछ त्यागकर पत्नीके साथ हाटकेश्वरक्षेत्रमें चले आये। वहाँ उन्होंने भगवान् शंकरका मनोहर मन्दिर बनवाया और एकाग्रचित्त होकर रैवतेश्वर नामवाले शिवलिंगकी स्थापना की, जो दर्शनमात्रसे समस्त देहधारियोंके पापोंको नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें राजा रैवतने जिन दुर्गादेवीका स्थापन किया था, उन्हींका


१४ समावर्तन, १५ विवाह, १६ उपाकर्म, १७ उत्सर्जन, १८ से २४ तक सात प्रकारके पाकयज्ञ—१ हुत, २ प्रहुत, ३ आहुत, ४ शूलगव, ५ बलिहरण, ६ प्रत्यवरोहण, ७ अष्टका होम, २५ से ३१ तक सात हविर्यज्ञसंस्था—१ अन्वाधान, २ अग्निहोत्र, ३ दर्शपौर्णमास, ४ चातुर्मास्य, ५ आग्रयणेष्टि, ६ निरूढ पशुबन्ध, ७ सौत्रामणि, ३२ से ३८ तक सात सोमयज्ञसंस्था—१ अग्निष्टोम, २ अत्यग्निष्टोम, ३ उक्थ्य, ४ षोडशी, ५ वाजपेय, ६ अतिरात्र, ७ आप्तोर्याम, ३९ वानप्रस्थ, ४० संन्यास, ४१ दया, ४२ अनसूया, ४३ शौच, ४४ अनायास, ४५ मंगल्य, ४६ अकार्पण्य, ४७ अस्पृहा, ४८ अन्त्येष्टि।