सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1076, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1076
* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *१०४७

धनदतीर्थका माहात्म्य, पूज्य और अपूज्य ब्राह्मण, वृषोत्सर्गकी महत्ता तथा गौतमेश्वरतीर्थकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजेन्द्र! तदनन्तर सब पापोंका नाश करनेवाले परम उत्तम धनदतीर्थमें जाय, जो नर्मदाके दक्षिण तटपर स्थित है। वहाँ स्नान करनेसे सब तीर्थोंका फल प्राप्त होता है। चैत्र मासके शुक्ल पक्षमें त्रयोदशी तिथिको उपवास करके रातमें जागरण करे और परम भक्तिपूर्वक वरदायक भगवान् शिवको स्नान करावे। तत्पश्चात् भक्तिपूर्वक पूजा करके गीत और वाद्यके द्वारा आराधना करे। प्रातःकाल अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको ब्राह्मणोंका पूजन करना चाहिये। जो ब्राह्मण दान नहीं लेते, विद्याके सिद्धान्तका प्रतिपादन करते और निन्दासे दूर रहते हैं, उनका भक्तिभावसे भरण-पोषण करना चाहिये। धनदतीर्थके प्रभावसे तीन जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है। यह तीर्थ दुष्टोंको स्वर्ग देनेवाला है और साधु पुरुषोंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है।

जो ब्राह्मण संस्कारहीन, आचारभ्रष्ट, नपुंसक, सूदखोर, खेती करनेवाले और भेददृष्टि रखनेवाले हों, उनका कोई पूजन न करे। जिसके घरमें शूद्र जातिकी स्त्री हो, जो भैंसेसे हल चलवाते या भैंसेपर भार लादते हों, ऐसे ब्राह्मणोंको श्राद्ध और व्रतमें दूरसे ही त्याग देना चाहिये। जो काने, कुण्ड (जो पिताके जीते-जी किसी जार पुरुषसे उत्पन्न हुए हों), गोलक (जो पिताकी मृत्युके बाद दूसरेसे उत्पन्न हुए हों) और वैद्यवृत्तिसे जीविका चलानेवाले हैं—वे भी व्रत और श्राद्धमें वर्जित हैं। यदि अपने पितरोंको ऊर्ध्वलोकमें भेजनेकी इच्छा हो तो सदा सर्वांगसुन्दर धर्मिष्ठ ब्राह्मणोंका पूजन करना चाहिये।

जो सदा धर्मचर्चामें तत्पर रहनेवाले, देवता, ब्राह्मण और गुरुजनोंके भक्त, तीर्थसेवापरायण, मातृभक्त, पितृभक्त, स्वामिभक्त, क्रोध-द्रोह आदि दुर्गुणोंसे रहित और सब प्रकारके सद्गुणोंसे युक्त हैं, वे ही मनुष्य स्वर्गलोकके अधिकारी हैं।

कार्तिक और वैशाखकी पूर्णिमाको स्नान करके पवित्र एवं जितेन्द्रिय होकर भगवान् शिवके समीप उन्हींकी प्रीतिके लिये वृषोत्सर्ग करे और यह कहे कि 'इस उत्सर्गसे ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेवजी प्रसन्न हों'—ऐसा करनेवाला मनुष्य भगवान् विष्णुके लोकमें पूजित होता है।

नर्मदाके उत्तर तटपर गौतमेश्वर नामक उत्तम तीर्थ है। महर्षि गौतमने सब लोगोंके हितकी इच्छासे स्वर्गकी सीढ़ीके रूपमें उस तीर्थकी स्थापना की है। युधिष्ठिर! वहाँ सब पातकोंका नाश करने और स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेके लिये जगद्गुरु महादेवजी निवास करते हैं।

नर्मदाके दक्षिण तटपर शंखचूड़ेश्वर नामसे प्रसिद्ध तीर्थ है। उस तीर्थमें स्नान करके पवित्र और एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक मधु, दही और घीसे भगवान् शंखचूड़को स्नान करावे। रातमें उनके आगे जागरण करे और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणोंका दही-भातसे सत्कार करे। जो उस तीर्थमें साँपके डसनेसे भी मृत्युको प्राप्त होता है वह भी भगवान् शंखचूड़की आज्ञासे उत्तम लोकमें जाता है।

o