सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशवीं पुतली १०. (७१)
कूदतेही जलके राख हो गया बैतालने देखा और तुरंत अमृत
ले आया और राजाके ऊपर डाला. अमृत पडतेही राजा 'राम
राम' करके खड़ा हो गया. और जितने ब्राह्मण वहां थे सो सब
जयजयकार करने लगे. वहां जो राजकन्या थी उसने आतेही
फूलोंका हार राजाके गलेमें डाल दिया. वह जयमाला जब
राजाको पहना दी तब सब लोग अचंभेमें रहगये कि, यह राजा
कोई अजब तरहका आया है, जो जल गया फिर जीता उठा.
यह काम मनुष्यका नहीं, यह कोई देवता है, जिसने ऐसा
काम किया. राजाकी नियत पूरी है. तब उस कन्याके ब्याहकी
तयारी हुई. राजाके मुल्कके जितने लोग वहां हाजिर थे वे
सब खुश हुए. और मंदिरमेंभी रानियां मंगलाचार करने लगीं.
इस तरह राजासे शादी कर दहेजमें " जवाहर जोड़े घोड़े,
हाथी, पालकी और तमाम माल असबाब कई करोड़का दिया.
यह देकर आधा राज्य संकल्प कर दिया. और दास दासीभी
बहुतसे दिये. तब यह बिरही जो इसके साथ था सो देख देख
बहुत खुश हुआ. जब ये सब दे ले चुके तब राजाने बिदा
माँगी. उस राजाने सब असबाब और माल उस ब्याही हुई
दुलहिन समेत साथ उसके कर रुखसत किया. और कहा-
अपने देशको तुम जाओ. और हमपर दया माया राखियो.
हमारा मुख इसलायक नहीं कि तुम्हारी कुछ तारीफ करें.
जैसा साहस तुमने किया वैसा न हमने आँखोंसे देखा