सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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ठहरता न था. कूद फांद रहा था. ज्यों ज्यों राजा' देखताथा
त्यों त्यों रीझताथा. आखिर पसंद करके कहा कि, इसको इस
मैदानमे फेरकर दिखायो. ज्योंही उसने कोडा किया. फिर तो
गर्दही नजर आतीथी. और घोडा मालूम न होताथा. जब ऐसे
गुण घोडेमे राजाने देख, तब दीवानको बुलाकर कहा कि-
एक लाख रुपये इसे दो. दीवानने अर्ज की-कि, महाराज ! यह
काठका घोडा और लाख रुपये इनाम मुनासिब नहीं. राजाने
दो लाख रुपये फरमाया. तब उस दीवानने उसके हवाले कर
दिये. और अपने दिलमें सोचा जो कुछ और तकरार करूंगा
तो रुपये और बढेंगे. वह बढई रुपय ले अपने घरको गया. घोडा
थानपर बांधा और वह यह कहतेहुये चला गया, कि, इसपर
सवार होते कोडा न कीजो, न ऐड मारियो पर किस्मतका
लिखा कोई मिटा नहीं सकता. जो बात हुई चहती है, सो
होतीही है कई दिनके बाद राजाने घोडा मंगवाया और अपने
मुसाहिबोंसे फरमाया कि, कोई तुममेंसे सवार होकर इस घोडेको
फेरे तो हम देखें यह बात सुनकर वे एकेकका मुंह देखने लगे.
घोडेकी चालाकीसे कोई न चढा. तब राजा झुंझलाकर बोला -
घोडेको साज लगाकर तैयार कर आओ. यह बात सुनक'
एककी जगह हजार आदमी दौडे और जल्दी तैयार कर लाए.
तब राजा सवार होकर वहां फेरने लगा, कि, वह चाहताथा कि
आसन जमाकर घोडेको अपने काबूमें लावे पर वह रानोंसे