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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 190 में से

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पृष्ठ 43

( ४० ) सिंहासनबत्तीसी.
हवेलीमें राजा जाकर रहा और बैठकर कुछ विचार करने लगा,
इतनेमें हाथ बाँधकर लक्ष्मी आन खडी हुई और बोली कि-धन्य
राजा विक्रम ! तेरे धर्मको. इतना कहकर लक्ष्मी उस वख्त तो
चली गई और राजाने तो वहां आराम किया. जब पहर रात
रही तब लक्ष्मी फिर आई और कहने लगी कि, राजा ! अब मैं
कहां गिरूं ? राजाने कहा-जो तू पड़ा चाहती हो तो पलंग छों-
डके जहां तेरी इच्छा हो तहां गिर इतनेमें खूब तरहसे सोनेका
मेह तमाम नगरमें बरसा. सुबह हुबा तब राजा उठा और देख
कर कहने लगा-हमारी रैयतपर बहुत सीखथी, लेकिन अब
कोई दिन निश्चित हो आरामसे रहेगी इतनेमें दीवान आया.
और खबर दी कि, महाराज ! तमाम नगरम कंचनकी वृष्टि हो
गई है इसवास्ते अब जो हुक्म आप करोगे वैसा हम करें. तब
राजाने कहा कि-तमाम नगरमें ढोल बजवादो कि जिसकी
हद्दमें जितनी दौलत है सो उसे ले. और कोई किसीको
मना न करे. यह राजाका हुक्म पाकर सब दौलत रय्यतने
अपने २ घरमें भरी यह बात कहकर चंद्रकला पुतली बोली कि-
राजा भोज ! सुन राजाविक्रमके गुण. वह ऐसा राजा था और
प्रजाका हितकारी, इससे तू किस तरह उसके सिंहासनपर
बैठता हे ? तेरी क्या जान है ? यह पुतलीकी बात सुनकर राजा
भोज अज्ञान होगया. और वररुचि पुरोहितभी शरमिंदा हुआ.