सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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खाया. तिस पीछे सोच उसको हुआ. निदान बनके जानेका
सामान किया. गज, पाट, धन, दौलत और रानीकी मोहब्बत
तजकर चला, न किसीसे पूछा न किसीको साथ लिया. ऐसा
निर्मोही होकर निकला कि, किसीका ध्यान न किया. देश देश
और नगर नगरमें चर्चा हुई कि राजा भर्तृहरि राज तजकर
योगी हुआ. और वह बात उड़ती उड़ती राजा इंद्रके अखाड़ेमें
पहुँची कि, राजा तो देश छोड़के चला गया, और उसके देशमें
बड़ा हुल्लड़ हुआ, तब यह बात सुनकर सब देवताओंने मिल
कर विचार किया कि, एक देवको रखवालीके वास्ते राजा
भर्तृहरिके देशमें भेजदो, कि कोई बिदअत रैयतपर न करे.
ऐसा ठहराय देवको बुलाकर वहां भेजदिया, और कहा वहांकी
निगाहबानी कर. वहां तो वह रखवाली करता था, और यहां
राजा विक्रमका योग पूरा हुआ, वह अपने मनमें मनसूबा करता
था कि, मैं छोटे भाईको राज देकर आयाहूं इस वास्ते अब चल
कर देखूं कि वह किसतरह राज करता है? यह अपने दिलमें
कहके चला और रातको नगरके पास आन पहुँचा. देवने
उसे आते देखा तब वह पुकारा-तू कौन है? जो इस वक्त
शहरमें जाता है। या तो अपना नाम बता, नहीं तो मैं तुझे मार
डालताहूं. तब उसने कहा-मैं राजा विक्रम हूं तू कौन है? जो
मुझे रोकता है? तब देव बोला-मेरे तईं देवताओंने भर्तृहरिके