सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 190 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 28

दूसरी पुतली २. ( २७ )
साअत यों टलगई दूसरे दिन फिर राजाने सिंहासनपर बैठनेकी
तय्यारी फरमाई और दीवानको बुलाकर कहा कि-तुम सब
तुरतही इसकी तैयारी करो. देर नहीं लगाना. यह बात सुनकर
वररुचि पुरोहित बोला-राजा ! अभी क्यों घबराते हो? इस
सिंहासनकी एक एक पुतली तुमसे बात करेगी. उन सबकी
बातें सुनकर पीछे जो कुछ आपको करना होगा सो कीजिये.
यह पुरोहितका बचन सुनकर राजाने उस सिंहासनके पास
जाकर उसपर पांव बढ़ाकर रक्खा इतनेमें चित्ररेखा नामक-
दूसरी पुतली २
बोली कि, राजा ! तेरे योग्य यह आसन नहीं, और ऐसी
अनीति कोई करता नहीं जो तू करनेपर तैय्यार हुआ है.
इस सिंहासनपर बैठ वह, जो विक्रमादित्यसा राजा हो. तब राजा
बोला-विक्रममे क्या क्या गुण थे? सो मुझसे कहो. तब वह बोली-एक
दिन राजा विक्रम कैलासको गया, और वहां एक यतीसे
मुलाकात हुई तब उसने राजाको योगकी रीति सब बताई.
राजाने अपने मनमें इरादा किया कि, अब योग कमावें. ऐसा
बिचार कर योग करनेको तैयार हुआ और राजतिलक भर्तृ-