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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 190 में से

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पृष्ठ 21

( १८ ) सिंहासनबत्तीसी
दौड़े और कौवे पकड़ पकड़ लाये, और पींजरेमें बंद किये
राजाने जाकर उन कौवोंसे कहा-अरे चांडाळा ! वह कौनसा
कौवा था कि जिसने हमारे मुँहपर बीट की ? तुम सच कहोगे
तो हम सबको छोड़ देंगे, नहीं कहोगे तो सबको मार डालेंगे.
यह राजाकी बात सुनके सब कौवे बोले-महाराज ! हममें कोई
कौवा नहीं रहा जो पकड़ा नहीं आया और वह काम हमसे
नहीं हुआ. तब राजा जियादः खफा हुआ और बोला कि-
तुम सबके सिवाय वह कौन कौवा है कि जिसने यह काम
किया ? तब उन्होंने कहा-महाराज ! सच पूछते हो तो हम
कहते हैं, बाहुबल एक राजा है, उदय अस्तग उसका राज है,
और उसका दीवान लूतबरन बड़ा दानी बहुत होशियार
पंडित है, वह कौवेके भेसमें रहता है. यह काम उसका हो तो
हो; क्योंकि कौवेकी सूरत एक वह बच रहा है. तब राजाने कहा
वह किस तरहसे हमारे पास आवै ? उसका बयान कुछ समझ-
कर मुझे इलाज बताओ ? कोई तुम्हारे यहांसे वकील जाय
और उसको ले आवै, तुम अपने यहांसे दो कौवोंको भेजदो
और वे जाकर उसको यहां ले आवें. तब उन्हींमेंसे दो कौवे
वहीं गये. उनकी लूतबरनने बहुतसी आव भगत की और
पूँछा कि, तुम यहां किसलिये आयेहो ? तब वे बोले महाराज !
तुम्हारे वगर हम सब कौवे मारे जातेहैं. इसवास्ते जो तुम राजा