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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 190 में से

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पृष्ठ 108

[Page-header: ( १०६ ) सिंहासनबत्तीसी.]

कृपासे सब काम सिध्द होगया है. महाजन खटोला लिये अपने
घरको आया. और ब्राह्मणको बुलाकर साथ लिया लडका
और आप उसपर बैठ समुद्रपार चला. एक अरसेमें वहां जाकर
पहुँचा. वहां जाकर देखे तो मंगलाचार सारे नगरमें हो रहा
है और सब लोग राह देखरहे हैं. जब लोगोंने देखा तो हाथों
हाथ ले गये. जाकर एक हवेलीमें उतारा और अपने सेठको
खबर दी कि, तुम्हारा संबंधी बरात लेकर आन पहुचा है. वह
सेठभी वहांसे उसकी मुलाकातको आप आया और इन तीन
आदमियोंको देखकर अपने जीमें बहुत पछताया. और पूंछा कि-
क्या सबब है जो तुम इस तरहसे आयेहो ? तब सब अवस्था
अपनी सुनाई. सुनतेही उस सेठने अपने गुमास्तेसे कहा कि-
कल ब्याह है और आज बरातकी तैयारी सब तुम जल्दी
करदो कि जिसमें शहरके लोग न हँसें. उन्होंने सब तैयारी
बात कहतेही करदी. दुसरे दिन बरात लेकर वह सेठ व्याहने
गया और बेटेका ब्याह किया. उस सेठने हाथी घोडे जोडे
पालकी मियाने जडाऊ गहने और बहुतसा कुछ दान दहेज
दिया. इसने वहांसे सब लेकर जहाजमें रखकर जहाज रवाना
कर दिया और आप खटोलापर सवार हो अपने शहरमें आया.
और नयेसिरमें शादी रचाई. ब्राह्मणोंको बहुत कुछ दान दिया
और कुछ जबाहिर पोशाक और बाजे तुहफा और तहायफ