सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयह सुनतेही वहखुशी होकर राजद्वारपर गया और द्वार-
पालसे कहा कि-मेरी खबर महाराजसे जाहिर कर दो. तब
दरवानोंने जाकर दीवानसे अर्ज की की, नगरसेठ द्वारेपर
हाजिर है. आपकी आज्ञा हो तो राजाके दर्शनको आवें. दिवा-
नने कहा कि—बुलाओ. दरवान आकार उस सेठको अंदर लेगया.
उसने वहां जाकर दीवानको दंडवत् की और बिनति कर कहने
लगा कि—महाराज ! आपके दर्शनको मैं आया हूँ और अपना
बडा जरुरका कामभी है. यह सुनकर दीवानने कहा कि—राजा
महलमें है. सेठ यह सुन अति उदास होगया और कहा कि—
मेरा बडा कार्य है सो कि, लडकेकी शादी है और जाना
तो समुद्रके पार है और चारदीन बीचमें बाकी हैं, इसमे जो न
पहुँच सकें तो मेरे कुलकी हंसी और बडी हागी होगी. बनियेसे यह
बात सुनकर दीवानने राजासे जाकर सब हकीकत जाहिर की
तब राजाने आज्ञा दी कि, वह उडनखटोला इसे लेजाकर दो
और जो कुछ वह कहेगा वैसीही सब तयारी करदो. जो किसी
तरह उनके काममें विघ्न न आवे. तब प्रधानने खटोला मँगवा
बनियको देदिया और कहा कि-जो कुछ सामान तुम्हें दर-
कार हो सो कहो महाराजका यह हुक्म हुवा है कि, उसको
जो कुछ चाहिये होय सो दे दो. तब सेठने कहा कि-महाराजकी
दयारो सब कुछ है पर मेरी यही जरुर थी और आपकि