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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( ७८ )
रघुनाथ शर्मा—ओमभटात्मज श्री रघुनाथ शर्मा ने शके १४८७ (ई० सन् १५६५) में
भास्कराचार्य और सूर्यसिद्धान्त मत से 'मणिप्रदीप' नामक करण ग्रन्थ की रचना की है ।
श्री मल्लारि—शके १४९३ (ई० सन् १५७१) में श्री दिवाकर दैवज्ञ के पुत्रों में
श्री कृष्ण एवं विष्णु दैवज्ञ से मल्लारि छोटे थे । अपने पिता दिवाकर दैवज्ञ से ज्योतिष-
शास्त्र का सम्यक् अध्ययन किया था। श्री गणेश दैवज्ञ कृत 'ग्रहलाघव' करण ग्रन्थ की
टीका श्री मल्लारि ने अत्यन्त शुद्ध एवं सूक्ष्म गणित साधिका उपपत्ति के साथ की है ।
श्री गणेण दैवज्ञ के समान ही गणित गोल वैदुष्य की असाधारण प्रतिभा के साथ श्री
मल्लारि में भी काव्य-साहित्य का प्रौढ़ पाण्डित्य और गणित की सूक्ष्मता स्पष्ट
परिलक्षित है ।
मल्लारि ने ग्रहलाघव की उपपत्ति में यत्र-तत्र-सर्वत्र अन्य सिद्धान्त ग्रन्थों के उदा-
हरण की अपेक्षा श्री भास्कराचार्य की सिद्धान्त शिरोमणि के उद्धरणों का विशेष रूप से
उल्लेख किया है ।
श्री रङ्गनाथ—श्री रङ्गनाथ का शके १४९५ (ई० सन् १५७३) में श्री काशी में
जन्म हुआ । इनके पिता का नाम श्री दैवज्ञ तथा माता का नाम गोजि था । कृष्ण दैवज्ञ
के अनुज तथा सिद्धान्त शिरोमणि के मरीचि भाष्य रचयिता श्री मुनीश्वर के पिता श्री
रङ्गनाथ हैं। इन्होंने शके १५२५ में सूर्यसिद्धान्त का सौरभाष्य 'गूढार्थप्रकाशिका' नाम
से रचा है। रङ्गनाथ के समय यूरोपीय लोगों का भारत के साथ व्यापार वृद्धिगत हो
चुका था। जैसा कि श्री रङ्गनाथ ने सूर्यसिद्धान्त के गोलाध्याय के यन्त्राधिकार के
२२वें श्लोक की टीका में स्पष्ट लिखा है—
“पारदाम्बुसूत्राणि शुल्बतैलजलानि च।
बीजानि पांसवस्तेषु प्रयोगास्तेऽपि दुर्लभा ॥” एवं
२२ श्लोक की टीका में—“इयं स्वयंवहविद्या समुद्रान्तरनिवासिजनैः फिरंगाख्यैः
सम्यगभ्यस्तेति ॥”
श्री रङ्गनाथ के उक्त स्पष्टीकरण से यह प्रतीत होता है कि तत्कालीन समय यूरोपीय
लोगों का भारत में गमनागमन बाहुल्य हो चुका था। सूर्यसिद्धान्त की रङ्गनाथकृत उप-
पत्तियों में प्रायः श्री भास्कराचार्य की सिद्धान्त शिरोमणि के सिद्धान्त की बहुलता से
उद्धृत हैं ।
शके १५२५ चैत्र शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, बुधवार की रात्रि में श्री सूर्योदयादिष्ट घटिका
४२।३० में प्रसव दुःख की असह्य वेदना से पीड़ित पत्नी के दुःख की उद्विग्नता से श्री
रङ्गनाथ दैवज्ञ ने "दुःख निवृत्त हो" सूर्य-सिद्धान्त की व्याख्या मैं ही लिखूँगा ।''''ऐसी
प्रतिज्ञा की ही थी कि उसी क्षण ग्रहगणित गोलज्ञ, सिद्धान्त शिरोमणि के मरीचि भाष्य-