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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 723 में से

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पृष्ठ 84

( ७७ )
श्री केशवः स्फुटतरं कृतवान् हि सौरा—
सन्नमेतदपि षष्टिमिते गतेऽब्दे—
दृष्ट्वा श्लथं किमपितत्तनयो गणेश ।
स्पष्टं यथा ह्यकृत् दृग्गणितैक्यमत्र,
कथमपि यदिदं भूरिकाले श्लथं स्यात् ।
मुहुरपि परिलक्षेन्दूग्ग्रहाद्युक्षयोग्यम्,
सदमलगुरुतुल्यप्राप्तबुद्धिप्रकाशैः ।
कथितसदुपपत्त्या शुद्धि केन्द्रे प्रचाल्ये ॥
वाराहाचार्य ने अपनी पञ्चसिद्धान्तिका में १—पौलिश, २—रोमक, ३—वासिष्ठ,
४—सौर एवं ५—पैतामह इन पाँचों में सूर्य सिद्धान्त का गणित "स्पष्टतरः” सविता
से सूक्ष्म कहा है। तदुपरि के आचार्यों ने सौर सिद्धान्त की अपेक्षा आर्यभट्ट का
गणित अधिक सूक्ष्म माना । कालान्तर में आर्यभट्ट का ग्रहगणित स्थूल हो जाने से ब्रह्म-
गुप्त का वेधसिद्ध ग्रहगणित सूक्ष्म हुआ । किन्तु बहुकालान्तर में ब्रह्मगुप्त की स्थूलता को
समझ कर श्री केशवाचार्य ने सौर एवं आर्य-सिद्धान्त के समीप का वेधसिद्ध ग्रहगणित
स्वीकार किया है। इस उत्तरोत्तर गणित-सूक्ष्मता प्राप्ति के लिए आचार्य गणेश ने स्पष्ट
दृग्गणितैक्य सिद्ध ग्रहगणित साधन पद्धति से भारतीय ज्योतिष को समुज्ज्वल किया है ।
इस सन्दर्भ में आचार्य गणेश का मत स्पष्ट है—"इस प्रकार के गणित के स्थूल भय को
दूर करने के लिये सूर्यचन्द्रग्रहणादि प्रत्यक्ष दृगयोग्यता सम्पादनार्थं समय-समय पर वेधादि
विचार से उत्पन्न त्रुटियाँ दूर करते हुए प्रश्न का समाधान करते रहना चाहिए। अर्थात्
सूक्ष्मता प्राप्ति हेतु ग्रहों में संस्कारान्तर स्वीकृत करने चाहिए" इत्यादि स्पष्ट भी कहा है।
सम्प्रति यह आशा की जा सकती है कि वर्तमान दृश्य एवं अदृश्य पञ्चाङ्गों का
भयंकर विवाद उक्त प्रमाणों से समाप्त हो जा सकेगा ।
श्री विष्णु दैवज्ञ — शक १४७८ (ई० सन् १५५६) में दिवाकर दैवज्ञ के पुत्र, कृष्ण
दैवज्ञ के अनुज श्री विष्णु दैवज्ञ ने सौरपक्षीय करण ग्रन्थ की रचना शके १५३० में की
है, जिस पर उन्हीं के भाई श्री विश्वनाथ दैवज्ञ ने शके १५४५ में उदाहरण द्वारा गणित
किया है।
श्री सूर्य—शके १४६३ (ई० सन् १५४१) में आचार्य भास्कर की लीलावती की
टीका श्री सूर्य ने गणितामृत भूमिका नाम से की है।
कृष्ण दैवज्ञ—कृष्ण दैवज्ञ यवन बादशाह जहाँगीर के प्रधान सभापण्डित थे । इनके
पिता का नाम श्री वल्लभ तथा माता का नाम गोजि था । इन्होंने "नवाङ्कुर" नाम की
श्रीमद्भास्कराचार्य की बीजगणित पर टीका रची है ।