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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( ५४ )
२८. गोल सन्धि से ग्रह बिम्बीय स्थान तक क्रांति वृत्तीय चाप का नाम भुजांश
चाप है, जो चापीय क्षेत्र का कर्ण है, तथा गोल सन्धि से ग्रह बिम्ब के ऊपर गये हुए ध्रुव
प्रोत वृत्त का क्रान्तिवृत्तीय ग्रह स्थान तक भुजांश कर्ण, एवं नाड़ीवृत्तीय स्थान तक विषु-
बांश कोटि, एवं ध्रुव प्रोतवृत्त में ग्रह की क्रान्ति-भुज, यह एक प्रसिद्ध चापीय क्षेत्र है ।
२९. क्षितिज और अहोरात्र वृत्त के सम्पात बिन्दु से पूर्व स्वस्तिक तक क्षितिज
वृत्तीय चाप का नाम अग्रा चाप है ।
३०. इसी प्रकार क्षितिज और दृग्वृत्त के सम्पात से पूर्व स्वस्तिक तक क्षितिज
वृत्तीय चाप का नाम दिगंश चाप है ।
३१. भूगोल केन्द्र से अपने खमध्य तक गए हुए सूत्र को ऊर्ध्वाधर सूत्र कहते हैं ।
एवं भूगर्भ से निरक्ष खमध्य तक गये सूत्र को निरक्षोर्ध्वाधर सूत्र कहते हैं ।
३२. इसी प्रकार भूगर्भ से, पूर्व स्वस्तिक तक गत वायु रूप सूत्र का नाम पूर्वापर
सूत्र, ध्रुव स्थान गत सूत्र का नाम ध्रुव सूत्र या ध्रुव यष्टि (Polar Axis) समस्थान गत
सूत्र का नाम सम सूत्र, कोणवृत्त क्षितिज सम्पात गत सूत्र का नाम कोण सूत्र, दृग्मण्डल
क्षितिज सम्पातगत सूत्र का नाम दृक्कुज सूत्र, भूगर्भ से क्षितिज अहोरात्र वृत्त सम्पात
गत सूत्र का नाम स्वोदयास्तसूत्र, उन्मण्डल अहोरात्र सम्पात गतसूत्र का नाम निरक्षो-
दयास्त सूत्र और भूगर्भ से इष्ट स्थान तक गये सूत्र का नाम इष्ट सूत्र हैं ।
३३. याम्योत्तर अहोरात्रवृत्त सम्पातस्थ ग्रह बिम्ब केन्द्र से उदयास्त सूत्र के ऊपर
लम्ब रूप सूत्र का नाम हृति है तथा पूर्वापर अहोरात्र वृत्त सम्पात से स्वोदयास्त सूत्र पर
लम्ब सूत्र का नाम तद्धृति है एवं किसी भी इष्ट स्थानीय ग्रहबिम्ब से स्वोदयास्त सूत्र
पर लम्बरूप सूत्र को इष्ट हृति कहते हैं ।
३४ निरक्षोदयास्त सूत्र तक उक्त इष्टहृति आदि के खण्डों का नाम कला है यह सब
द्युज्या वृत्तीय लघुवृत्तीय होते हैं । अतः ग्रहगणित के उपयोग के लिए इनका मान
त्रिज्यावृत्त अर्थात् बृहद्वृत्त में परिणत कर बृहद्वृत्तीय किया जाता है ।
३५. द्युज्यावृत्तीय हृति का त्रिज्यावृत्तीय परिणत स्वरूप अन्त्या होता है ।
३६. सर्वत्र पूर्वापर और स्वोदयास्त सूत्रों का अन्तर अग्रा होती है । पूर्वापर और
निरक्षोदयास्त सूत्रों का अन्तर क्रान्ति ज्या होती है । निरक्षोदयास्त और स्वोदयास्त
सूत्रों का अन्तर कुज्या होती है ।
३७. इष्ट स्थानीय ग्रह बिम्ब से स्वोदयास्त सूत्र तक गये हुए सूत्र को इष्ट शंकु
कहते हैं ।
यह शंकु अनेक स्थानों से अनेक प्रकार के होते हैं । मुख्यतः पूर्वापराह्रोरात्र-वृत्त
सम्पात से क्षितिज धरातलगत सूत्र को पूर्वापर शंकु (समशंकु) एवं याम्योत्तराहोत्र-वृत्त