सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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१८. इन सम्पातों में किसी एक केन्द्र से (Centre of a Circle) नब्बे अंश चाप
की दूरी पर बने हुए वृत्त का नाम अयन प्रोतवृत्त (Solstitial Colour Lircle) है।
१९. मेष से कन्या तक ६ राशि उत्तर गोलार्द्ध (Northarn Hemis Phere)
में, तुला से मीन तक ६ राशियाँ दक्षिण गोलार्द्ध (Southern Hemis Phere) में
होती है ।
२०. उक्त उसी प्रकार कर्क से धनु राशि तक उत्तर अयन एवं मकर से ६ राशि
मिथुन तक दक्षिण अयन सन्धि (Solsfitial Point) होती है ।
२१. क्रान्ति वृत्त और विवृत्त के योग बिन्दु का नाम क्रान्तिपात (Equinoctial
Point) है। इसी को सूर्य चन्द्र ग्रहण का कारणीभूत राहु (Ascending Node of
the Moon's Orbit) कहते हैं ।
२२. किसी भी अभीष्ट समय में क्रान्ति वृत्त का जो प्रदेश बिन्दु उदय क्षितिज
(Horizon) में लगा रहता है उसे उदय लग्न और अस्तक्षितिजीय बिन्दु को अस्त लग्न
कहते हैं ।
२३. जिन-जिन बिन्दुओं में कोई महद्वृत्त किया जाता है उन्हीं बिन्दुओं के नाम से
उस महद्वृत्त को वही बिन्दुप्रोत नाम दिया जाता है। जैसे—दोनों ध्रुवों से इष्ट स्थान
पर किये गये वृत्त का नाम ध्रुवप्रोत वृत्त एवं दोनों समस्थानों और ग्रह बिम्ब पर गये
वृत्त का नाम समप्रोतवृत कहा जाता है।
२४ नाडीवृत्त से ग्रह बिम्ब तक ध्रुवप्रोत वृत्त में क्रान्ति (Declination) चाप
होता है। क्रान्ति चाप को ९० में घटाने से शेष का नाम द्युज्या चाप होता है। ध्रुव
बिन्दु को केन्द्र (Centre of Circle) मान कर द्युज्या चाप तुल्य व्यासार्ध से रचित
वृत्त (Circle) का नाम अहोरात्र वृत्त (Diurnal Circle) है।
२५ ग्रह बिम्ब के केन्द्र में होते हुए कदम्बप्रोतवृत्त जहाँ पर क्रान्तिवृत्त के साथ
सम्पात करता है, उस सम्पात बिन्दु से ग्रह बिम्ब तक कदम्बप्रोत वृत्त में ग्रह का शर
(Celestial Latitude) होता है। यह बिम्बीय स्थानीय अहोरात्र वृत्तों का अन्तर हैं,
जिसमें ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति ज्ञात होती है ।
२६. क्षितिज और अहोरात्र वृत्त के सम्पात के ऊपर किया गया ध्रुव प्रोत वृत्त जहाँ
पर नाडी वृत्त के साथ सम्पात करता है उस सम्पात बिन्दु से पूर्व स्वस्तिक बिन्दु तक
चर काल होता है । इसके अहोरात्र वृत्तीय लघु स्वरूप का नाम कुज्या है ।
२७ ग्रह बिम्ब से पूर्वापर वृत्त तक समप्रतोदृत में भुजांश चाप है। भुजांश चाप
को नब्बे में कम करने से शेष का नाम उपवृत्त व्यास होता है। भुजांश चाप की ज्या
नलिका वेध के समय भुज संज्ञक है ।