सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 432, कुल 723 में से
संदर्भ में पढ़ें३३० गोलाध्याये
पृथ्वी की छाया दीर्घ सूची आकार की होकर कभी-कभी चन्द्रमा को लांघ कर अत्यन्त
दूर तक सूची आकार से आकाश में चली जाती है ।
अनुपात से चन्द्र ग्रहणाधिकार गणिताध्याय में भू भा बिम्ब, चन्द्र बिम्ब शर और
छाया दैर्घ्य का साधन किया जा चुका है ।
उपपत्ति—क्षेत्र देखिए—
सूर्य = सू
चन्द्र = च
पृथिवी = पृ०
च म च' प = चन्द्र कक्षा
स्प स्प' = सूर्य बिम्ब
स्प" प स्प"' = दो स्पर्श रेखा
छा य = छाया दैर्घ्य
स्प' स्प"' रेखाओं के मध्यगत चन्द्र बिम्ब का स्प' = स्पर्श स्प" पर मोक्ष होता है D
तथा दैर्घ्य छा स्प' य स्प" द = छाया और छाया होता है ॥२॥३॥४॥५॥६॥
इदानीं छादकनिर्णयमाह—
छादकः पृथुतरस्ततो विधोरर्धखण्डिततनोर्विषाणयोः ।
कुण्ठता च महति स्थितियंतो लक्ष्यते हरिणलक्षणग्रहे ॥७॥
अर्धखण्डिततनोर्विषाणयोस्तीक्ष्णता भवति तीक्ष्णदीधितेः ।
स्यात्स्थितिलघुरतो लघुः पृथक्छादको दिनकृतोऽवगम्यते ॥८॥
दिग्देशकालावरणादिभेदान्न च्छादको राहुरिति ब्रुवन्ति ।
तन्मानिनः केवलगोलविद्यास्तत्संहितावेदपुराणबाह्यम् ॥९॥
राहुः कुभामण्डलगः शशाङ्कं शशाङ्कगश्छादयतीनबिम्बम् ।
तमोमयः शम्भुवरप्रदानात्सर्वागमानमविरुद्धमेतत् ॥१०॥