सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रह युति वर्णनम् १८१
वित्रिभ लग्न से पश्चिम रहने पर ग्रह से स्फुट लम्बन घटायेंगे । लम्बन संस्कार
करने के बाद ग्रहों की स्थिति में जो अन्तर आता है (संस्कार के पहले कला
समान था)
ततो गतैष्यकालः स्याद् यावान् समकलीकृतौ
गतियोगान्तर वशात् प्राग्वत् लम्बन स्फुटम् । ७१ ।
उससे योग का गत एष्यं काल निकाल कर पुनः समकला करेंगे । इस
समकला के समय का स्फुट लम्बन निकाल कर पुनः ग्रह को संस्कृत करेंगे ।
और फिर उनकी कला समान करेंगे । यह बार बार करने से वास्तविक युद्ध
काल आयेगा ।
दूरत्वात् गति शून्यत्वात् भानाम् अनति भावतः ।
तत्खेट संयुतौ काल खेट गत्या गतः परम् । ७२ ।
ग्रह और नक्षत्र का योग- नक्षत्र पृथ्वी से दूर होने के कारण उनकी गति या
नति शून्य (प्रतीत) होती है । अतः उनसे ग्रह का योग केवल ग्रह गति द्वारा ही
निकाला जाता है ।
सम्भवे बिम्ब भेदस्यान्योऽन्यं तारा नभः सदाम्
लम्बनावनती साध्ये नान्यत्र क्लिष्ट भावतः । ७३ ।
लम्बन और नति साधन कठिन होने के कारण यह संस्कार केवल ग्रहों के
भेद युद्ध (एक बिम्ब में दूसरा बिम्ब आ जाय) के समय किया जाता है । अन्य
प्रकार के युद्ध में इतनी सूक्ष्म गणना जरूरी नहीं है ।
ग्रहवत् युति काले तु साध्यो भिन्नैक दिग् गतौ ।
भुक्ति योगान्तरा लाभ्यां स्व स्वमाना नुसारतः । ७४ ।
बुध और शुक्र द्वारा सूर्य का भेद-युद्ध ग्रहण (या ग्रह युदि) के समान विपरीत
दिशा में चलते हुए गति से और समान दिशा में चलते ग्रह का गति अन्तर द्वारा
अपने अपने बिम्ब परिमाण अनुसार स्पर्श आदि का समय निकालना चाहिये ।
वक्रयो रल्प शरयोः कदाचित् बुध शुक्रयोः
सूर्य मण्डल भेद स्यात् तात्कालिक भुक्ति योगतः । ७५ ।
वक्री बुध और शुक्र का शर बहुत कम होने के समय उनके द्वारा रवि बिम्ब
का वेध होता है । यहां स्पर्श आदि समय रवि बुध या रवि शुक्र के गति योग
द्वारा निकाला जाता है ।
बिम्ब भेदे ऽपि चैतेषां चन्द्रेण स्यात् समागमः ।
नति लम्बन सिद्धेन स्पर्श मोक्षादि पूर्ववत् । ७६ ।
ताराग्रह और चन्द्र की युति - नति और लम्बन द्वारा स्पष्ट चन्द्र का संस्कार
कर उसमें ग्रह बिम्ब द्वारा वेध का स्पर्श आदि समय सूर्य बिम्ब वेध की तरह