सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिलेख वर्णनम् १६७
बिन्दु तक की रेखा जिस बिन्दु पर ग्राह्य वृत्त की परिधि से मिलती है वह मोक्ष
बिन्दु होता है। इष्ट घटी (समय) में ग्रह बिम्ब का कितना ग्रास होगा यह दिखाने
के लिये ग्राहक मार्ग का मध्य बिन्दु के दोनों तरफ दो खण्ड मानेंगे। स्पर्श की
दिशा में (चन्द्रग्रहण के लिए पूर्व सूर्य के लिए पश्चिम) स्पर्श खण्ड तथा दूसरा
मोक्ष खण्ड।
तदंगुलो स्पार्शिक मौक्षिकाख्ये यातैष्य दिच्छा घटिकादि निघ्ने
स्थित्यर्द्ध कालेन निजेन भक्ते फलागुलांन्ते पथि बिन्दु मेकम् । २३ ।
स्पर्श और मोक्षखण्ड की अंगुलों में लम्बाई नापेगे। अंगुल को इष्ट घटी से
गुणा कर स्पार्शिक स्थिति अर्द्ध से भाग देंगे (इष्ट ग्रास स्पर्श के बाद होने से)
तथा मोक्ष अंगुल को मोक्ष होने में जितना समय बाकी है उससे गुणा कर मोक्ष
स्थिति अर्द्ध से भाग देंगे। जितना स्पर्श बिन्दु से ग्राहक खण्ड पर स्पर्श अंगुल
के बराबर दूरी पर या मोक्ष बिन्दु से मोक्ष अंगुल की दूरी पर एक बिन्दु देंगे।
दत्वा तदच्छादक खण्ड तुल्य सूत्रेण वृत्तम् विरचय्य तेन
संछादितं ग्राह्य मभीष्ट काले दृश्यं स्वकालागुलका नुपातात् । २५ ।
स्पर्श या मोक्ष के अंगुलान्त बिन्दु से ग्राहक बिम्ब के व्यासार्द्ध के बराबर
त्रिज्या का वृत्त करेंगे। इस वृत्त द्वारा ग्राह्य बिम्ब का जितना खण्ड ढंगेगा, इष्ट
समय में उतना ही ग्रास होगा।
सद्द्रष्टु मिष्ट ग्रसन स्वरूप मानैक्य खण्डांगुलतो विशोध्य
ग्रासांगुलं स्वेष्ट मितोऽवशिष्टांगुल प्रमाणा सरला शलाका । २६ ।
ग्राह्य और ग्राहक बिम्ब योगाद्धं अंगुल से इष्ट ग्रास अंगुल घटायें। शेष
अंगुल के बराबर की एक शलाका (Pointer) लें।
ग्राह्यार्द्धतो मार्ग मुखी प्रसार्य स्पर्शे विमोक्षे स्वदिशि क्रमेण ।
यत्र स्पृशेद् ग्राहक मार्गमेषा लेख्यं ततो ग्राहक बिम्ब मानम् । २७ ।
यह शलाका ग्राह्य बिम्ब के केन्द्र से स्पार्शिक इष्ट में मार्ग की दिशा में तथा
मौक्षिक इष्ट में मोक्षमार्ग की दिशा में रखेंगे। शलाका ग्राह्यमार्ग को जिस स्थान
पर स्पर्श करेगी उस बिन्दु से ग्राहक बिम्बार्द्ध के व्यासार्द्ध का वृत्त खींचेंगी।
ग्राह्य भवेच्छन्न मनेन यावत्तावान् ग्रहे दृक् समता मुपैति ।
मानान्तराद्धेन मिता शलाका प्रासार्य संस्पर्श दिशीन्दु केन्द्रात् । २८ ।
यह बिम्ब ग्राह्य बिम्ब को जितना ढंकता है उतना ही इष्ट ग्रास दिखाई देगा।
ग्राह्य और ग्राहक बिम्ब का अन्तर कर उसकी आधी लम्बाई की शलाका को
चन्द्र ग्रहण में चन्द्र बिम्ब केन्द्र से तथा सूर्य ग्रहण में सूर्य बिम्ब केन्द्र से स्पर्श
दिशा में रखेंगे।