सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ सिद्धान्त दर्पण
किंवैवं करणाब्दजाः खनग गो वेदो (४९७०) न कल्यब्दतो
दस्राः स्यु विधु वारतो रवि (१२) मितैः खैर्वातदब्दायुताः
क्ष्माथैर्न्दिद्विषष सम गुण मै (२,७३,७७,८५,१५१) र्भक्ताः फलं वासरा
मेषार्क क्रमण द्वितीय दिनतस्तत्सं क्रमान्ता गताः । ५५ ।
करणाब्द (ग्रन्थ रचना का समय कलि ४९७० या ई १.८६८) आरंभ से ग्रह
आदि लाने के लिए करणाब्द से ही अहर्गण निकालना होगा । कलि गत वर्ष
की संख्या से ४९७० घटाने से गत करणाब्द होगा । इसके दाहिने १२ शून्य देकर
उसमें, २,७३,७७,८५,१५१ से भाग दें । फल सोमवार (संक्रान्ति काश्य दिन
सोमवार था) से आरम्भ गत दिन संख्या होगी । स्फुट मेष संक्रान्ति द्वितीय दिन
से अहर्गण होगा ।
संक्रान्तेः सविता तृतीय दिवसे मध्योऽधुनैति क्रियं
प्रायेणैतदहस्ततः कृतिमंतं पञ्चांग पञ्जीमुखम् ।
तत् पूर्वाह्नि याव वासरगणे रानीय मध्य प्रहा-
नेक द्वयादिषु पञ्जिका दिन गणे ब्राढ्या स्वमुक्तोः क्रियात् । ५६ ।
साधारणतः स्पष्ट सूर्य मेष राशि से प्रवेश करने के तृतीय दिन मध्यम सूर्य
मेष राशि में आता है । अतः स्फुट मेष संक्रमण का तृतीय दिन १ अहर्गण या
पञ्चांग का मुख दिन गिना जाता है । अतः मध्यम सूर्य मेष राशि में आने के
पूर्व दिन या स्पष्ट सूर्य के मेष संक्रमण के द्वितीय दिन मध्यम ग्रह का साधन
किया जाता है । उसमें प्रति दिन की ग्रह गति जोड़ने से अभीष्ट दिन का मध्य
ग्रह मिलता है ।
केचित्प्रस्फुट मेष संक्रम दिनं चैत्रादि मन्येतिथिं
मन्यन्ते ऽब्द मुखञ्च देशवशतो भेदेऽपि वर्षेऽ त्र हि
ग्लौवारे प्रतिपद प्रगे गति निशा शेषे तु मेषे ऽविशत्
सूक्ष्मोऽर्क स्तदिह ध्रुवो ऽरचि दिने मध्यार्क वर्षान्तजे । ५७ ।
कहीं स्फुट सूर्य मेष में प्रवेश करने के लिए और कहीं ही चैत्रशुक्ल प्रतिपदा
से वर्ष का आरम्भ गिना जाता है, कई पण्डित (चान्द्र और सौर) वर्षों का भेद
भी नहीं मानते हैं । मध्यम मान के सौर वर्ष समाप्त होने पर करणाब्द का आरम्भ
माना गया है । उस दिन सोमवार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा थी तथा स्पष्ट सूर्य उसकी
पूर्व रात्रि के अन्तिम समय में मेष में प्रवेश कर चुका था । उस दिन के लिए
ग्रहों की मध्य ध्रुवा, उच्च और पात सूक्ष्म रूप से दिया हुआ है ।
कथ्यन्ते करणाब्द पूर्व दिवसे वारे विधोः साधिते ।
लंका कोंदय कालिकां दिविषदां क्षेत्रांशकादि ध्रुवाः
भूयोऽपि प्रतिपत्तये तनुधियां प्रत्यब्द शुद्धिस्र्थः ।
सूर्यारादिक मन्द तुंग निचपस्यारादि पातावलेः । ५८ ।