सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहानयन वर्णनम् २७
ग्रह के कल्प भगण को १८४१ से गुणा कर ४००० से भाग देने पर द्वापर युग
क अन्त का भगण ध्रुव होगा । कलियुग आदि से इष्ट दिन के अहर्गण द्वारा मध्यम
ग्रह निकाल कर द्वापरान्त ध्रुव में जोड़ने से सृष्टि आदि से इष्ट दिन तक का मध्यम
ग्रह होगा ।
कुजादि खग पञ्चकार्क मुख मन्दचन्द्रादिणा
तजध्रुव विलिप्तिकाः कलिमुखार्ध रात्रे य था ।
गजांगतिथि वेद दृक् शशधराः (१२४१५६८) (मं) कृताक्षिश्वर
त्रिचन्द्रशशिनः (११३७२४) (बुशी) खदृग् रस भुजाभुजंगा ( ८२६२०)
(वृ) क्रमात् । ५२ ।
कलि आरम्भ मध्यरात्रि के समय का क्रम सेसे मंगल आदि पांच ग्रहों के
स्थान, सूर्य आदि (सात) ग्रहों के मन्दोच्च तथा चन्द्र, आदि (६) ग्रहों के पात
सभी विलिप्ता में लिखे जाते हैं । मंगल विलिप्ता (१२४१५६८) बुध शीघ्रोच्च
(११३७२४)तथा वृहस्पति (८२६२०) हैं ।
खवेदख मरुभुवो (१४९०४०) (शुशी)ऽब्धि
भुजदिक् नवेशाश्च (११९१०२४-श) षड् घनाग्नि गज बाहंवः ।
(२८३१७६ रवि मन्द) खनृप वेद रामाब्धयः
(४३४१६०- चन्द्र मन्द) ख वेदवसु
षट् शराम्बु निधयः (४५६८४० मंगल मन्द)
खवेदेक्षण त्रिचन्द्र भुजगाः (८१३२४०-बुधमन्द)
खदृग् गगन चन्द्र शून्यर्तवः । । ( ६०१०२०.वृम) । ५३ ।
शुक्रशीघ्रोच्च - १४९०४० शनि ११९१०२४ रवि मन्दोच्च (२८३१७६ ) चन्द्रमन्दोच्च
(४३४१६०), मंगल मन्दोच्च (४५६८४०) बुध मन्दोच्च (८१३२४०) तथा वृहस्पति
मन्दोच्च (६०१०२०) विलिप्तायें कलि आरम्भ में थे ।
गजाब्धिशर तत् त्र्युमे (२३५५४८- शुक्रमन्द)
खवसु वाद्धवगांक द्विपा (८९७४८० - शनि मन्द)
द्विपाह्रागकृताक्ष्यगा (७२४७८८- चन्द्रपात)
वसु रदाब्धि पूर्णेन्दवः (१०४३२८) मंगल पात)
द्विमांग ख वसुन्धरा (१०६२७२-बुधपात)
ख रस गोऽर्थ तत्वा (२५५९६०- वृहस्पति पात) न्यथो
नखाभ्रारस गो भुवो (१९६०२०-शुक्र पात)
नख रसेषु दन्ता (३२५६२०-शनि पात) इति । ५४ ।
शुक्रमन्द (२३५५४८), शनिमन्द (८९७४८०) चन्द्रपाद (७२४७८८) मंगल पात
(१०४३२८) बुधपात (१०६२७२) वृहस्पति पात (२५५९६०) शुक्रपात (१९६०२०)
तथा शनिपात (३२५६२०) विलिप्ता कलि आरम्भ में थे ।