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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 276 में से

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पृष्ठ 265

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५१


एवं गुरुकृपां विहाय ब्रह्मविद्या | उसी प्रकार गुरुकृपाके बिना ब्रह्म-
दुर्लभेति त्वरान्वितस्य मुख्याधि- | विद्याका प्राप्त होना अत्यन्त कठिन है
कारिणो महात्मन उत्तमस्यैते | यह सोचकर जिसे ब्रह्मज्ञानप्राप्तिके
कथिता अस्यां श्वेताश्वतरोप- | लिये अत्यन्त उतावली लगी हुई है
निषदि श्वेताश्वतरेण महात्मना | उस मुख्याधिकारी उत्तम महात्माको ही
कविनोपदिष्टा अर्थाः प्रकाशन्ते | ये कथित—इस श्वेताश्वतरोपनिषद्में
स्वानुभवाय भवन्ति । द्विर्वचनं | महात्मा श्वेताश्वतरद्वारा उपदेश किये
मुख्यशिष्यतत्साधनादिदुर्लभत्व- | हुए तत्त्व प्रकाशित अर्थात् स्वानुभवके
प्रदर्शनार्थमध्यायपरिसमाप्त्यर्थ- | विषय होते हैं। 'प्रकाशन्ते महात्मनः'
मादरार्थञ्च ॥ २३ | इन पदोंकी द्विरुक्ति मुख्य शिष्य और
| उसके साधनोंकी दुर्लभता प्रदर्शित
| करनेके लिये, अध्यायकी समाप्तिके
| लिये तथा आदरके लिये है ॥२३॥


इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य-
श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये
षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥


॥ समाप्तमिदं श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्यम् ॥
॥ ॐ तत्सत् ॥