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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 276 में से

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पृष्ठ 264

२५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
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मेव गुरुणा प्रकाशिता विद्या- | युक्त पुरुषोंके प्रति प्रकाशित की
| हुई विद्या ही अनुभवकी प्राप्ति
नुभवाय भवतीति प्रदर्शयति— | करानेवाली होती है—
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ।
प्रकाशन्ते महात्मनः ॥२३॥
जिसकी परमेश्वरमें अत्यन्त भक्ति है और जैसी परमेश्वरमें है वैसी
ही गुरुमें भी है उस महात्माके प्रति कहनेपर ही इन तत्त्वोंका प्रकाश
होता है ॥२३॥
यस्येति । यस्य पुरुषाधि- | ‘यस्य’ इत्यादि । जिस अधिकारी
कारिणो देवे इयता प्रबन्धेन | पुरुषकी देवमें—यहाँतकके ग्रन्थद्वारा
| वर्णन किये हुए अखण्डैकरस
दर्शिताखण्डैकरसे सच्चिदानन्द- | सच्चिदानन्द परमज्योतिःस्वरूप
परज्योतिःस्वरूपिणि परमेश्वरे | परमेश्वरमें परा—उत्कृष्टा यानी
| अकृत्रिमा भक्ति है, यह [ अचञ्चलता
परोत्कृष्टा निरुपचरिता भक्तिः । | और श्रद्धाका भी ] उपलक्षण है ।
एतदुपलक्षणम् । अचाञ्चल्यं | तात्पर्य यह है कि जिसकी भगवान्-
| के प्रति जैसी निश्चलता और श्रद्धा
श्रद्धा चोभे यथा तथा ब्रह्म- | है वैसी ही ये दोनों ब्रह्मवेत्ता गुरुके
विद्योपदेष्टरि गुरावपि तदुभयं | प्रति भी हैं उसके लिये, जैसे
यस्य वर्तते तस्य तप्तशिरसो जल- | तपे हुए मस्तकवाले पुरुषके लिये
| जलाशयको खोजनेके सिवा और
शयन्वेषणं विहाय यथा साध- | कोई उपाय नहीं है तथा क्षुधातुर
नान्तरं नास्ति यथा च बुभुक्षितस्य | पुरुषको भोजनके सिवा और कोई
भोजनादन्यत्र साधनान्तरं न, | उसकी शान्तिका साधन नहीं है