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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 276 में से

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पृष्ठ 206

१९२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
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अभिन्नरूपसे स्थित हैं उसे इस प्रकार जानकर पुरुष मृत्युके पाशोंको
काट डालता है ॥१५॥
स एवेति । स एव प्रकृतः | 'स एव' इत्यादि । वह प्रकृत
कालेऽतीतकल्पेषु जीवसञ्चित- | परमेश्वर ही कालमें—अतीत कल्पों-
में अर्थात् जीवोंके सञ्चित कर्मोंके
कर्मपरिपाकसमये भुवनस्य गोप्ता | फलोन्मुख होते समय भुवनका गोप्ता
तत्तत्कर्मानुगुणतया रक्षिता । | यानी विभिन्न जीवोंके कर्मानुसार
उनका रक्षक था। वह विश्वाधिप—
विश्वाधिपः विश्वस्य स्वामी । सर्व- | विश्वका स्वामी, समस्त भूतोंमें गूढ
भूतेषु गूढो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु | अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त
साक्षिमात्रतयावस्थितः । यस्मिं- | समस्त प्राणियोंमें साक्षीरूपसे स्थित है।
श्चिद्घनानन्दवपुषि परे युक्ता | जिस चिद्घनानन्दविग्रह परमात्मामें
युक्त—ऐक्यभावको प्राप्त हैं; कौन ?
ऐक्यं प्राप्ताः । ते के ? ब्रह्मर्षयः | सनकादि ब्रह्मर्षि और ब्रह्मादि
सनकादयः । देवता ब्रह्मादयः । | देवगण । उसी ईश्वरको जानकर
तमेवेश्वरं ज्ञात्वा ब्रह्माहमस्मीत्य- | अर्थात् 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार
साक्षात्कार कर [ पुरुष ] मृत्युके
परोक्षीकृत्य मृत्युपाशान् मृत्यु- | पाशोंको काट डालता है । अविद्या
रविद्या तमो रूपादयश्च पाशाः | अर्थात् तम ही मृत्यु है तथा रूपादि
विषय पाश हैं, क्योंकि उनमें ही
पाश्यन्त इति पाशास्तान् “मृत्युर्वै | जीव पाशित ( बद्ध ) होते हैं, अतः
तमः” (बृ० उ० १ । ३ । २८) | वे पाश हैं; श्रुति कहती है—"अज्ञान
इति श्रुतेः । तत्कार्यकाम- | मृत्यु ही है।” उस ( अज्ञान )
कर्मच्छिनत्ति नाशयति । ऐक्य- | के कार्य काम और कर्मादिको काट
डालता यानी नष्ट कर देता है;
रूपस्वप्रकाशाग्निना दहतीत्यर्थः | अर्थात् ऐक्यरूप स्वप्रकाशाग्निसे भस्म
॥ १५ ॥ | कर देता है ॥ १५ ॥
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