श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 205, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९१
[संस्कृत-भाष्यम्]
सूक्ष्मेति । पृथिव्याद्यव्याकृ-
तान्तमुत्तरोत्तरं सूक्ष्मसूक्ष्मतरमपे-
क्ष्येश्वरस्य तदपेक्षया सूक्ष्मतमत्व-
माह—सूक्ष्मातिसूक्ष्ममिति ।
कलिलस्याविद्यातत्कार्यात्मकदुर्ग-
स्य गहनस्य मध्ये । शेषं व्या-
ख्यातम् ॥१४॥
[भाषार्थ]
'सूक्ष्मातिसूक्ष्मम्' इत्यादि ।
'सूक्ष्मातिसूक्ष्मम्' इस पदसे श्रुति
पृथिवीसे लेकर अव्याकृतपर्यन्त जो
उत्तरोत्तर सूक्ष्म और सूक्ष्मतर हैं
उनकी अपेक्षा भी ईश्वरकी सूक्ष्मतमता
बतलाती है । कलिलके मध्यमें अर्थात्
अविद्या और उसके कार्यरूप दुर्ग--
गहन [ स्थान ] के मध्यमें । शेष
अंशकी पहले व्याख्या हो चुकी
है ॥१४॥
—००:०:००—
[अवतरणिका]
[संस्कृत] परस्य साक्षिरूपेणावस्थितत्वं सनकादिभिर्ब्रह्मादिदेवैश्चाधिकारिपुरुषैरप्यात्मतया प्राप्यत्वं साधनचतुष्टयादियुतास्मदादीनां मोक्षसिद्धिं चाह—
[हिन्दी] अब परमात्माके साक्षिरूपसे स्थित होने, सनकादि और ब्रह्मादि देवताओं एवं अधिकारी पुरुषोंद्वारा आत्मस्वरूपसे प्राप्तव्य होने तथा साधनचतुष्टयादिसे सम्पन्न होनेपर हम लोगोंको भी मोक्ष प्राप्त होनेका प्रतिपादन किया जाता है--
[मूल मन्त्र]
स एव काले भुवनस्य गोप्ता
विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः ।
यस्मिन्युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च
तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति ॥१५॥
[मन्त्रार्थ]
वही अतीत कल्पोंमें विश्वका रक्षक था, वही विश्वका स्वामी और
सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित है । [ ऐसे ] जिस परमात्मामें ब्रह्मर्षि और देवगण
[पाद-टिप्पणी]
वीर्यमल्पकालस्थं कलिलमित्युच्यते । 'अथवा जगदारम्भकाणामपां बुद्बुदस्य पूर्वा-
वस्था कलिलमित्युच्यते । फेनिलान्युदकानीत्यर्थः' अर्थात् स्त्रीके रजसे मिला
हुआ पुरुषका वीर्य कुछ काल स्थित रहनेपर 'कलिल' कहा जाता है । अथवा
जगत्की रचना करनेवाले जलके बुलबुलेकी पूर्वावस्था 'कलिल' कही जाती है अर्थात्
फेनयुक्त जल ।