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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 276 में से

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पृष्ठ 150

१३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

ध्यते । तेनोपसंहृत्य तेन प्रत- | इसका [ संनिवेश और तरण ]
| दोनोंके साथ सम्बन्ध है । अर्थात्
रेतातिकामेद्विद्वान्स्रोतांसि संसार- | प्रणवके द्वारा मन और इन्द्रियोंको
सरितः स्वाभाविकाविद्याकाम- | नियमित कर प्रणवहीसे विद्वान् संसार-
| सरिताके स्वाभाविक अविद्या, कामना
कर्मप्रवर्तितानि भयावहानि प्रेत- | और कर्मोंद्वारा प्रवर्तित भयावह—
तिर्यगूर्ध्वप्राप्तिकराणि पुनरावृत्ति- | प्रेत, तिर्यक् एवं ऊर्ध्व योनियोंको प्राप्त
| करानेवाले पुनरावृत्तिके हेतुभूत
भाञ्जि ॥ ८ ॥ | स्रोतोंको पार कर लेता है ॥ ८ ॥
प्राणायामका क्रम और उसकी महत्ता
प्राणायामक्षपितमनोमलस्य चित्तं | प्राणायामके द्वारा जिसके पाप
प्राणायाम- ब्रह्मणि स्थितं भव- | क्षीण हो गये हैं उसका चित्त ब्रह्ममें
निर्देशः | स्थिर हो जाता है, इसलिये प्राणायाम-
तीति प्राणायामो | का वर्णन किया जाता है । पहले
निर्दिश्यते । प्रथमं नाडीशोधनं | नाडीशोधन करना चाहिये । उसके
कर्तव्यम् । ततः प्राणायामेऽधि- | पीछे प्राणायाममें अधिकार होता है।
कारः । दक्षिणनासापुटमङ्गु- | दायें नासारन्ध्रको अँगूठेसे दबाकर
ल्यावष्टभ्य वामेन वायुं पूरये- | बायेंसे यथाशक्ति वायु खींचे।
द्यथाशक्ति । ततोऽनन्तरमुत्सृज्यैवं | तत्पश्चात् दायीं नासिकाको छोड़कर
दक्षिणेन पुटेन समुत्सृजेत् । | इसी प्रकार [ वाम नासारन्ध्रको
सव्यमपि धारयेत् । पुनर्दाक्षिणेन | अँगुलीयोंसे दबावे और] दायेंसे वायुको
पूरयित्वा सव्येन समुत्सृजेद्यथा- | बाहर निकाले। फिर दायेंसे पूरक करके
शक्ति । त्रिः पञ्चकृत्वो वा एवम् | यथाशक्ति बायें नासिकारन्ध्रसे रेचक
अभ्यस्यतः सवनचतुष्टयमपररात्रे | करे । इस प्रकार शेषरात्रि, मध्याह्न,
मध्याह्ने पूर्वरात्रेऽर्धरात्रे च पक्षा- | पूर्वरात्रि और अर्धरात्रि इन चार
| समय तीन-तीन या पाँच-पाँच बार
| अभ्यास करनेवालेकी एक पक्ष या एक