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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 526 में से

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पृष्ठ 137

प्रथमोऽध्यायः ५१

और बान्धव (खानदान के लोग) तथा सांढे के लिये सेवासम्बन्धी अधिकार का प्रदान करे। और जो गुरुजन या मित्र हों उन्हें अपने दोषों को देखने के लिये नियुक्त करे।

वस्त्रालंकारपात्राणां स्त्रियो योज्याः सुदर्शने ॥ ३५१ ॥
स्वयं सर्वे तु विमृशेत्पर्यायेण च मुद्रयेत् ।

वस्त्र, अलंकार तथा बर्तनों की देखभाल करने के लिये स्त्रियों को नियुक्त करे। और सभी कार्यों को पर्याय (पारी-पारी) से स्वयं निरीक्षण करने के बाद अपना मोहर लगा दे। अर्थात् इस कार्य का निरीक्षण हो चुका है इसका मुहर लगावे।

अन्तर्वेश्मनि रात्रौ वा दिवाऽरण्ये विशोधिते ॥ ३५२ ॥
मन्त्रयेन्मन्त्रिभिः सार्धं भाविकृत्यं तु निर्जने ।

रात्रि के समय भलीभाँति देखभाल कर महल के अन्दर और दिन में निर्जन जङ्गल में आगे होने वाले कार्यों के विषय में मन्त्रियों के साथ विचार करे।

सुहृद्भिर्भ्रातृभिः सार्धं सभायां पुत्रबांधवैः ॥ ३५३ ॥
राजकृत्यं सेनपैश्च सभ्याद्यैश्चिन्तयेत्सदा ।

परिषद् की व्यवस्था का निर्देश— राजा सभा के बीच में मित्र, भाई, पुत्र, बान्धव, सेनापति और सभासद् (मेम्बर) गणों के साथ राजकार्य के विषय में सदा विचार करे।

सभायां प्रत्यगर्धस्य मध्ये राजासनं स्मृतम् ॥ ३५४ ॥
दक्षसंस्था वामसंस्था विशेयुः पार्श्वकोष्ठगाः ।

और राजसभा में पश्चिम ओर मध्य में राजा का सिंहासन रहना चाहिये। और उसके पार्श्व के स्थानों में बैठनेवाले लोग दक्षिण तथा वामभाग में बैठें।

पुत्राः पौत्रा भ्रातरश्च भागिनेयाः स्वपृष्ठतः ॥ ३५५ ॥
दौहित्रा दक्षभागात्तु वामसंस्थाः क्रमादिमे ।

पुत्र, पौत्र, भाई और भानजे तथा दौहित्र ये सब सिंहासन के पृष्ठ भाग में दक्षिण और बाएँ तरफ क्रम से बैठें।

पितृव्याः स्वकुलश्रेष्ठाः सभ्याः सेनाधिपास्तथा ॥ ३५६ ॥
स्वाग्रे दक्षिणभागे तु प्राक्संस्थाः पृथगासनाः ।
मातामहकुलश्रेष्ठा मन्त्रिणो बांधवास्तथा ॥ ३५७ ॥
श्वशुराश्चैव श्यालाश्च वामाग्रे चाधिकारिणः ।

चाचा, अपने कुल के श्रेष्ठ सभासद्, सेनापति ये सब सिंहासन के आगे...