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सर्वकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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पृष्ठ 469

( ३६४ )

ही, जूने मारकर निकाल देती है। इसलिये जिन्हें संसारमें सुख भोगना हो, वे वैश्याके नज्दीक न जावें।

किसीने क्या खूब कहा है :—

गाना न० १

रगड़ी नहीं किसी को यार, ओ घर बार लटाने वाले।
तीखे नयन चलाने वाले, रगड़ी नहीं किसी को यार ॥
इनका कूठा है जंजाल, इनका खोटा है व्यवहार।
इसमें नफा नहीं है यार, ओ घरबार लटाने वाले ॥
इनके नखेरे इनकी चाल, इनके चिकने-चिकने गाल।
इनके लम्बे-लम्बे बाल, आकृत करने वाले ॥
रड़ी नहीं किसीको यार, ओ घर-बार लटाने वाले।
इनकी उद्दबत, इनको बातोंमें मत आना ॥
इसपर दिलको मत ललचाना, इनकी उद्दबतसे घराना।

आकृत था जाय जाने वाले।
रगड़ी नहीं किसी को यार।
ओ घर-बार लटाने वाले ॥
जब तक पैसा तबतक रगड़ी।
जबतक बिलसे तबतक मगड़ी।
वह तो खा-खा हुई मुछगड़ी।
तुम पर आने लगे तमाले।
जब से रुक गई घरकी मोरी।
माँगो भीख करो या चोरी।
अब तो हवा जेल की खा ले।
रगड़ी नहीं किसी की यार।
ओ घर-बार लटाने वाले ॥