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सर्वकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( ३७५ )

तू नहीं समझत अन्य, सदा इन्हीं को चाहे ।
अपनी हथी आप, आपने तन को दाहे ॥
कह गिरधर कविराय, जो प्रत्यक आनन्द धन रे ।
तिसहि मांहि रह लीन, सुखी तब होवे मन रे ॥

औरमी :—

कुरडलिया ।

रे मन ! भौतिक वर्ग में, तू महन्त परधान ।
तेरे पाछे हैं सबै, देह बुद्धि इन्द्रिय आन ।
देह बुद्धि इन्द्रिय प्राण, इन्होंमें तू है नायक ।
किया तेरे आधीन, मानसी-बाचिक-कायिक ।
कह गिरधर कविराय, होवे तबहीं धनधन रे ।
जब निर्वाकार हो रहे, सर्वथा इक रस मन रे ॥

व्यप्यय ।

काम निरन्तर गान-तान, सुनिबोही चाहत ।
लोचन चाहत रूप, रैन-दिन रहत सराहत ।
नासा अतर-सुगन्ध, चहत फूलन की माला ।
त्वचा चहत सुख-सेज, संग कोमल-तन बाला ।
रसनाहू चाहत रहत, नित खाटे मोटे चरपरे ।
इन पंचन या प्रपञ्च सौं, भूपनको भिन्नू करे ॥८७॥