शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १८ )
चञ्चल अचपल, मटके चटके, सर खोले टैंके हँस-हँस के ।
क्रुह क्रुह की हँसावट और गुज्रव, ठठों की उड़ावट बेसी ही ॥७॥
हर वक्त फुन हर आन सजै, दम-दम में बदलै लाख सजै ।
बाहों की रूपक, घुँघट की अदा, जोबनकी दिखावट बेसी ही ॥८॥
पाठक ! मनचले पाठक ! आप ही बिचारिये, इस आनवान
और खूबसूरती वालीकी कौन भूल सकता है ? जो इन स्त्री-
रत्नों की कद्र जानने वाले हैं, उनकी नज़रोंसे इनके नीलकमल
को आभा रखने वाले नीलमसे नेत्र कभी उतर ही नहीं सकते ।
उन्हें तो हर ओर नीलम या नील-कमल ही नील-कमल फूले
दीखते हैं और वे मन-ही-मन उनकी अनुपम छटा को याद कर-
करके प्रसन्न होते हैं ।
छप्पय ।
कबहुँ भौहको भंग, कबहुँ लज्जायुत दरसत ।
कबहुँक ससकत संकि, कबहुँ लीलारस बरषत ।
कबहुँक मुख मृदुहास, कबहुँ हित बचन उषारत ।
कबहुँक लोचन फेर, चपल चहुँ ओर निहारत ।
छिन-छिन सुचरित्र विचित्र करि, भरे कमल जिमि दशहुँदिशि ।
ऐसी अनूप नारी निरख, हरषत रहिये दिवस-निशि ॥४॥
सार—जिस तरह ब्रह्मज्ञानियोंको हर ओर
ब्रह्म ही ब्रह्म दीखता है ; उसी तरह कामियों