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सर्वकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १७ )

इनके चञ्चल नेत्र ही नेत्र दिखाई देते हैं ; अर्थात् उनका मन इनके नीलकमलवत् सुन्दर नेत्रोंमें ही जा बसता है । जिसमें जिसका दिल जा बसता है, उसे वही-वह दीखता है । वृ॒क्ति कामियोंकी आँखोंमें कमसिन अल्पवयस्का नवविवाहिता कामिनियाँ समा जाती हैं ; अतः उन्हें हर ओर, जहाँ तक उनकी दृष्टि जाती है, वही-वह दिखाई देती हैं ।

किसी ऐसी ही उठती जवानीकी कम-उम्र परीकी लुब-सुरती का चित्र महाकवि नज़ीरने क्या ही कारीगरीसे खींचा है :—

पलकों की रूपक, पुतली की फिरत, सुरमे की लगावट वैसी ही ।
ऐयार नजर, मक्कार अदा, त्योरी की चढ़ावट वैसी ही ॥१॥
वह अँखियाँ मस्त नशीली सौं, कुछ काली सौं, कुछ पीली सौं ।
चितवन की दगा, नज़रोंकी कपट, सीनोंकी लड़ावट वैसी ही ॥२॥
वह रात अँधेरी बालों सी, वह मँग चमकती बिजली सी ।
ज़ूलकों की खुलत, पड़ी की जमत, चोटी की गुँवावट वैसी ही ॥३॥
वह छोटी-छोटी सख्त कुँचै, वह कच्चे-कच्चे सेव गजब ।
अँगिया की भड़क, गोठोंकी चमक, बन्दों की कसावट वैसी ही ॥४॥
वह चन्द्रचल चाल जवानी की, ऊँची ऐड़ी नीचे पन्ने ।
कफ़शों की खटक, दामनकी भटक, ठोकरकी लगावट वैसी ही ॥५॥
कुछ हाथ हिलें, कुछ पाँव हिलें, फड़कें बाजू थिरकै सब तन ।
गाली वो बला, ताली वो सिद्धाम, उँगली की नचावट वैसी ही ॥६॥

२