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सर्वकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २२२ )

फिर कोरा चला जाता है। तात्पर्य यह कि, कामिनियोंके कारण से मनुष्य इस संसार-सागरसे पार नहीं हो सकता। उसके इस काममें वे बाधा डालती हैं। सब है, संसारमें यदि कामिनी और काञ्चन न होते, तो फिर किसीको भी इस भव-सागरके पार करनेमें कठिनाई न होती। रसिक कवि ने पू्व कहा है—

दोहा ।

जो होती नहिं नार, मदभाती मृगलोचनी ।
जगकेपरलीपार, गमन न दुर्लभ कहुक था ॥

सोरठा ।

जो नहिं होती नार, तो तरिबौ जगमें सुगम ।
यह लींबी तरवार, मार लेत अथबीचही ॥

सार--संसार-सागरसे पार होनेमें, नेत्रोंसे
जादू करनेवाली सुन्दरी स्त्रियाँ ही बाधा-
स्वरूप हैं ।

68. O world, it would not have been very difficult to cross you if there were not this great obstacle in the form of woman having beautiful eyes.

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