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सर्वकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १७२ )

तथाप्येतद्भूमौ न हि परहितात्पुण्यमधिकं
न चास्मिन्संसारे कुवल्यष्टशो रम्यमपरम् ॥५२॥

आप वेदान्तवेत्ताओंके माननीय गुरु हो और हम उत्तम काव्य-
रचयिता कविओंके सेवक हैं ; तोभी हमें यह बात कहनी ही पड़ती है
कि, परोपकारसे बढ़कर पुण्य नहीं है और कमलनयनी सुन्दरी स्त्रियों
से बढ़कर और सुन्दर पदार्थ नहीं है ॥५२॥

खुलासा—आप वेदान्त-पारङ्गत पण्डितोंके मान्य गुरु हैं।
आपमें अपार विद्या-बुद्धि है। हम कुछ पढ़े-लिखे विद्वान् नहीं,
केवल काव्यशास्त्र-विनोदी कवीश्वरोंके अनुचर हैं। तोभी ; हमें
अपनी समझके अनुसार कहना पड़ता है कि, इस जगत्में “परो-
पकार” से उत्तम पुण्य नहीं है और “भूमनयनी कामिनियों” से
बढ़कर दूसरी सुन्दर वस्तु नहीं है। इसलिये बुद्धिमानोंको, धन
उपार्जन करके, तन-मन-धनसे परोपकार-पुण्य सम्बन्ध करना
और सुखोचना कामिनियोंके साथ भोग-विलास करना चाहिये।
संसारमें रहने वालोंके लिये ये दोनों ही परमोत्तम कर्म हैं। हाँ,
जिनका दिल इस नापायेंदार दुनियासे उदास या खट्टा हो गया
है, उनकी बात दूसरी है।

छप्पय ।

पढ़े वेद-वेदान्त, भंये विद्योदधि पारा ।
तिनहूँके तुम गुरु, बुद्धिवल पाय अपारा ॥