शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 170, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( १४३ )
हम भी अपने मनचले पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ महाकवि कालि-
दासके “श्रतुसंहार”से एक श्लोक नीचे उद्धृत करते हैं :—
समदमधुकरायां कोकिलानाञ्च नादैः
कुसुमितसहकारैः कर्णिकारैश्च रम्यैः ।
इधुभिरिव सुतीक्ष्णैर्मानस मानिनीनां
तुदति कुसुममासो मन्मयोदीपनाय ॥
यह कुसुम मास मतवाले भौरों, कोकिलके शब्दों, अत्यन्त
तेज़ तीरोंके समान बौरे हुए आमके वृक्षों और मनोहर करनेके
वृक्षोंके द्वारा, कामोदीपन करनेके लिये, मानिनी स्त्रियोंके मनो
को विद्ध कर रहे हैं ।
व्यथय ।
चिरहीजन-मन ताप करन, वन अम्बा मोरे ।
पिकहू पञ्चम हेर टेर, बिरही किये वौरे ॥
भौर रहे मबाय, पुहुप पांडलके महकत ।
प्रफुलित भये पलास, दशों दिशि दौसी दहकत ॥
मलयगिरिवासी पवनहु, काम अग्नि प्रज्वलित करत ।
बिन कन्त वसन्त असन्त ज्यों, घेर रही यह नहि टरत ॥३६॥
सार—आम की मंजरियोंका खिलना,
कोकिलाका उन्हें उत्कंठासे देखना और मलय