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शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १३० )

इस जगत्में, कामी पुरुषोंके लिये नवयुवतियोंके कठोर कुव-
युगल और सघन स्पर्श जड़ूओसे बढ़कर सुखदायी और दूसरा
पदार्थ नहीं है ; इसलिये वे उन्हींका सेवन कर अपना मनुष्य-
जन्म सुफल करें । पर जिन्हें इस संसारको असारता और बन्ध-
लताका ज्ञान हो गया है, जिन्हें रूप-यौवनकी अनित्यताका हाल
मालूम हो गया है, और इसलिये कामिनियोंसे घृणा हो गई है,
उन्हें सब द्विविधा त्याग, कहीं निजें और रमणीक स्थानमें, गङ्गा
के तट पर पर्णकुटी बना, शिव-शिव रटना चाहिये । कामिनियों
के भोगनेसे यहाँ अपूर्व सुखकी प्राप्ति होगी, पर परलोकमें दुःखों
का सामना करना पड़ेगा ; मगर सबको तज, गङ्गा किनारे जा,
हर भजन करनेसे यहाँ भी सुख-शान्ति मिलेगी और वहाँ भी ।
पाठकोंके समक्ष दोनों राहें हैं । अब उन्हें जौनसी राह
पसन्द हो उसे ही चुन लें । त्रिशङ्कु की तरह बीचमें
लटकना और—

इधरके रहे न उधरके रहे ।

खुदा ही मिला न विसाले सनम ॥

वाली कहावत चरितार्थ करना भला नहीं ।

दोहा ।

वास कीजिये गंग तट, पाप निवारत बारि ।

‘के कामिनि कुच युगलको, सेवन कहु बिचारि ॥३१॥

सार—गङ्गा-तट पर बसना और कामिनि-