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सर्वकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 219
  • बालकाण्ड *

२१७

कानन्हि कनक फूल छबि देहीं । चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं ॥
चितवनि चारु भूकृटि बर बाँकी । तिलक रेख सोभा जनु चाँकी ॥

कानोंमें सोनेके कर्णफूल [अत्यन्त] शोभा दे रहे हैं और देखते ही [देखनेवालेके] चितको मानो चुरा लेते हैं। उनकी चितवन (दृष्टि) बड़ी मनोहर है और भीहें तिरछी एवं सुन्दर हैं। [माथेपर] तिलककी रेखाएँ ऐसी सुन्दर हैं मानो [मूर्तिमती] शोभापर मुहर लगा दी गयी हैं ॥ ४ ॥

दो०— रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस।

नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस ॥ २१९ ॥

सिरपर सुन्दर चौकोनी टोपियाँ [दिये] हैं, काले और घुँघराले बाल हैं। दोनों भाई नखसे लेकर शिखातक (एडीसे चौटीतक) सुन्दर हैं और सारी शोभा जहाँ जैसी चाहिये वैसी ही है ॥ २१९ ॥

देखन नगर भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए ॥
धाए धाम काम सब त्यागी। मनहुँ रंक निधि लूटन लागी ॥

जब पुरवासियोंने यह समाचार पाया कि दोनों राजकुमार नगर देखनेके लिये आये हैं, तब वे सब घर-बार और सब काम-काज छोड़कर ऐसे दौड़े मानो दरिद्री [धनका] खजाना लूटने दौड़े हों ॥ १ ॥

निरखि सहज सुंदर दोउ भाई। होहिं सुखी लोचन फल पाई ॥
जुबतीं भवन झरोखन्हि लागीं। निरखहिं राम रूप अनुरागीं ॥

स्वभावहीसे सुन्दर दोनों भाइयोंको देखकर वे लोग नेत्रोंका फल पाकर सुखी हो रहे हैं। युवती स्त्रियाँ घरके झरोखोंसे लगी हुई प्रेमसहित श्रीरामचन्द्रजीके रूपको देख रही हैं ॥ २ ॥

कहहिं परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती ॥
सुर नर असुर नाग मुनि माहीं। सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं ॥

वे आपसमें बड़े प्रेमसे बातें कर रही हैं—हे सखी! इन्होंने करोड़ों कामदेवोंकी छबिको जीत लिया है। देवता, मनुष्य, असुर, नाग और मुनियोंमें ऐसी शोभा तो कहीं सुननेमें भी नहीं आती ॥ ३ ॥

बिष्णु चारि भुज बिधि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी ॥
अपर देउ अस कोउ न आही। यह छबि सखी पटतरिअ जाही ॥

भगवान् विष्णुके चार भुजाएँ हैं, ब्रह्माजीके चार मुख हैं, शिवजीका विकट (भयानक) वेष है और उनके पाँच मुँह हैं। हे सखी! दूसरा देवता भी कोई ऐसा नहीं है जिसके साथ इस छबिकी उपमा दी जाय ॥ ४ ॥