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सर्वकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 82 में से

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पृष्ठ 25

इसी प्रकार गुरु अष्टकम् में आया है -
शरीरं सरूपं तथा वा कलत्रं यशश्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यम् ।
गुरोरंघ्रिपद्मे मन श्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ॥
सुन्दर सुडौल सुरुपवान शरीर, उसी भांति की रुपवती पत्नी विस्तृत विशाल निर्मल
यश कीर्ति अपार धन दौलत होने पर यदि गुरु के चरण कमलों के अग्रभाग में मन नहीं
रमता तो सब व्यर्थ गया यानि व्यर्थ नष्ट कर दिया। अस्तु सद्गुरु के पादपद्मों में मन को
लीन करना ही जीवन धन सारवान है।
प्रस्तुत लघुकाय ग्रन्थ में गुरुगीता, गुरु स्तवराज एवं गुरु अष्टकम् के श्लोकों का
हिन्दी अर्थ करके दिया गया है। पीठ में रात्रि कालिक माई की आरती और क्षमापन स्तोत्र
भी हिन्दी अनुवाद सहित दिया गया है। साधना के क्षेत्र में गुरु का स्थान सर्वोपरि होता
है। परन्तु संस्कृत पाठ का भावार्थ जानते हुए पाठ हृदय को गुरु के सानिध्य में शीघ्रता
से ले जाता है। मात्र शाब्दिक पाठ बहुत अधिक समय बाद ही प्रभावी होता है। इसी
अंतप्रेरणा को शायद महाराज जी समझ गये थे और उन्होंने मुझे यह कार्य करने की शक्ति
प्रदान की।
इस लघुकाय ग्रन्थ की मूल प्रेरणा के रूप में हैं-श्री पीताम्बरा-पीठाधीश्वर अनन्त
श्री विभूषित राष्ट्र गुरु श्री स्वामी जी महाराज। उन्हीं के शुभाशीर्वाद से प्रस्तुत पुस्तक में
दिये गये श्लोकों का हिन्दी अनुवाद कर सका हूँ।
ग्रन्थ के प्रकाशन का कार्य श्री पीताम्बरा पीठ कर रहा है। पीठ के न्यासी श्री हरिराम
सावला जी के प्रति मैं आभार व्यक्त करता हूँ। व्याकरणाचार्य एवं पीठ के आचार्य पं.
ओमनारायण शास्त्री द्विवेदः जी ने अपना बहुमूल्य समय देकर प्रस्तुत पुस्तक के श्लोकों
के अनुवाद को आद्योपांत पढ़कर प्रस्तावना लिखी है। मैं उनका हृदय से सदैव ऋणी रहूंगा।
उनके प्रति मैं आभार प्रकट करता हूँ।
पुस्तक के मुद्रण का व्यय भार आगरा निवासी श्री नरेन्द्र पञ्जवानी ज्योतिषाचार्य ने
सहर्ष वहन किया है। एतदर्थ मैं उन्हें साधुवाद ज्ञापित करता हूँ और भगवती की कृपा के
लिये मैं पीताम्बरा माता से प्रार्थना भी करता हूँ।
कथावाचक पं. यशोदानन्द मिश्र प्रयागराज (उ.प्र.) ने इस कार्य में अथक परिश्रम
किया है अतएव उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।
साधक एवं तांत्रिक डॉ. सूर्यप्रकाश मिश्र ने शुभकामना देकर मुझे अनुग्रहीत किया
है। अस्तु उनके प्रति भी मैं आभार व्यक्त करता हूँ। झाँसी निवासी भाई मधुर वर्मा संचालक
स्वाधीन प्रेस द्वारा पुस्तक टंकण कार्य बड़ी सावधानी से किया गया है, एतदर्थ उन्हें भी
मैं साधुवाद देता हूँ।
विनयावनत
डॉ. मोतीलाल खङ्गरशास्त्री
(मास्टर जी)
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