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सर्वकोश
श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 82 में से

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पृष्ठ 24

दो शब्द
गुरु तत्त्व बोध का सागर है
गुरु रित्यक्षरं देवि जपतो मम निश्चितम्।
ब्रह्म हत्या पुरामुक्ता सत्यमेतन्न संशय॥
परशुरामो मातृ वधात् देवेन्द्रो ब्रह्महिंसनात्।
पातकादपि मुक्तअभूत गुरोरुच्चारण मात्रतः (गुरु तन्त्र)
सप्तकोटि महामन्त्र निश्चितं विश्रंश कारकाः
एक एवं महामंत्रो गुरुरित्यक्षरद्वयम्
मन्त्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम्
स्मृति वेद पुराणाना सारमेव न संशय
गुरु सेवा परमतीर्थ अन्य तीर्थ निरर्थकम्
सर्व तीर्थाश्चि ये देवि सद्गुरु चरणाम्बुजम् (गुरु गीता)
सात करोड़ महामंत्र चित्त को भ्रमित करने वाले हैं 'गुरु' दो अक्षर का एक मात्र ही महामंत्र
सर्वोपरि है। 'गुरु' दो अक्षर ही मंत्रों का राजा है जो स्मृति, वेद, पुराण आदि का निःसंदेह
सारभूत है। जिसकी वाणी से 'गुरु' अक्षर ही व्यवहारित होता है उसे कोई मोह नहीं होता।
वेद पढ़ने की आवश्यकता उसे नहीं रह जाती। ग-कार के उच्चारण मात्र से ब्रह्म हत्या
का दोष नहीं लगता। उ-कार के उच्चारण मात्र से जन्म मरण के पापों से छूट जाता है।
रेफ उ-कार और विसर्ग के उच्चारण मात्र से कोटि जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। परशुराम
माता के वध से, इन्द्र ब्रह्म हत्या के पाप से 'गुरु' का उच्चारण करने मात्र से मुक्त हुए
थे।
गुरुस्तवराज में आया है -
ध्यानं दैवत पूजनं गुरुतपोदानाग्निहोत्रादयः
पाठो होम निवेषणं पितृमखाह्याभ्यागतार्च्चा बलिः।
एते व्यर्थफला भवन्ति सततं यस्य प्रसादं बिना
तं वन्दे शिवरुपिणं निजगुरुं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्॥
ध्यान, योग, पूजा जप तप या दान हवन श्राद्धादि कर्म महान गुरुतरतप व्रत पाठ आतिथि
अभ्यागत का विधिवत पूजागत सत्कर्म सम्मान ये समस्त शुभ कार्य जिनकी कृपा प्रसाद
बिना सुफलदायी नहीं होते अर्थात् निरन्तर ही व्यर्थ फलाश्रित हो जाते हैं ऐसे शिवस्वरूप
कल्याणकारी समस्त सिद्धियों के प्रदाता अपने समर्थ सदगुरु की वंदना करता हूँ।
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