श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरिकै परीच्छा दई दीच्छा संग रानी दई, भई हमारी करौ परदा न सन्त सौं।
दीयौ धन घोरा कछू राख्यो दै निहोरा भूप, मान तन छोरा बड़ौ मान्यौ जीव जन्त सौं।।
सुनि जरि बरि गये भाई सेनसूरज के, ऊरज प्रताप कहा कहैं सीताकन्त सौं।
आयौ बनिजारौ मोल लियौ चाहैं खेलनि कौं, दियौ बहकाय कहौ पीपा जू अनन्त सौं।।२६६।।
बोल्यौ बनिजारौ 'दाम खोलि खैला दीजिये जू!' 'लीजिये जू!' आय गाँव चरन पठाये हैं।
गये उठि पाछे बोलि सन्तनि महोच्छौ कियौ, आयौ वाही समैं कही लेहु मन भाये है।।
दरसन करि हिये भक्तिभाव भर्यौ आनि, आनिकै वसन सब साधु पहिराये हैं।
और दिन न्हान गये घोड़ा चढ़ि छोड़ि दियौ, लियौ बाँध्यौ दुष्टन ने आयौ मानौ ल्याये है।।२६७।।
गये हे बुलाये आप पाछे घर सन्त आये, अन्न कछू नाहिं कहूँ जाय करि ल्याइयै।
विषई बनिक एक देखिकै बुलाइ लई, दई सब सौज कही 'सही निसि आइयै'।
भोजन करत माँझ पीपा जू पधारे, पूछी वारे तन प्रान जब कहिकै सुनाइयै।
करिकै सिंगार सीता चली झुकि मेह आयौ, काँधे पै चढ़ायौ वपु बनिया रिझाइयै।।२६८।।
हाट पै उतार दई द्वार आप बैठे रहे, चहे सूके पग माता! कैसे करि आई हौ?।
स्वामी जू लिवाय ल्याये कहाँ हैं? निहारौ जाय, आय पाँय पर्यो डर्यो राखौ सुखदाई हौ।।
मानौ जिन शंक काज कीजियै निशंक धन, दियौ बिन अंक जौपै लरैं मरैं भाई हौ।
मर्यो लाज भार चाहै धसौं भूमि फार दृग, बहै नीर धार देखि दई दीच्छा पाई हौ।।२६९।।
चलत-चलत बात नृपति श्रवन परी, भरी सभा विप्र कहैं बड़ी विपरीत है।
भूप मन आई यह निपट घटाई होत, भक्ति सरसाई नहीं जानै घटी प्रीति है।।
चले पीपा बोध दैन द्वार ही तैं सुधि दई, लई सुनि कही आवौं करौं सेवा रीति है।
'बड़ौ मूढ़ राजा मोजा गाँठै बैठ्यौ मोची घर', सुनि दौरि आयो रहे ठाढ़े कौन नीति है।।३००।।
हुती घर माँझ बाँझ रानी एक रूपवती, माँगी 'वही ल्यावौ वेगि' चल्यौ सोच भारी है।
डगमग पाँव धरै पीपा सिंह रूप करै, ठाढ़ौ देखि डरै इत आवै आप ख्वारी है।।
जाय तौ विलाय गयौ तिया ढिंग सुत नयौ, नयो भूमि पर 'कला जानी न तिहारी है'।
प्रगट्यौ सरूप निज खीजिकै प्रसंग कह्यौ, 'कहाँ वह रंग?' शिष्य भयो लाज टारी है।।३०१।।
कियौ उपदेस नृप हृदै में प्रवेस कियौ, लियौ वही पन आप आये निज धाम है।
बोल्यौ एक नाम साधु 'एक निसि देहु तिया', 'लेहु' कही भागौ संग भागी सीता बाम है।।
प्रात भये चलैं नाहिं 'रैन ही की आज्ञा प्रभु', चल्यौ हारि आगे घर-घर देखो ग्राम है।
आयौ वाही ठौर 'चलो माता! पहुँचाय आवौं', आय गहे पाँव भाव भयौ गयौ काम है।।३०२।।