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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 195 में से

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पृष्ठ 88

गागरौनगढ़ बढ़ पीपा नाम राजा भयो, लयो पन देवी सेवा रंग चढ़्यो भारियै।
आये पुर साधु सीधौ दियौ जोई सोई लियो, कियो मन माँझ प्रभु ! बुद्धि फेरि डारियै ।।
सोयो निसि रोयो देखि सपनो बेहाल अति, प्रेत विकराल देह धरिकै पछारियै।
अब न सुहाय कछू वहू पाँय परि गई, नई रीति भई वाहि भक्ति लागी प्यारियै ।। २८२ ।।
पूछ्यो हरि पाइवे कौ मग जब देवी कही, 'सही रामानन्द गुरु करि प्रभु पाइयै'।
लोग जानै बौरौ भयौ गयौ यह काशीपुरी, फुरी मति अति आये जहाँ हरि गाइयै ।।
द्वार में न जान देत आज्ञा ईश लेत कही, राजा सौं न हेत सुनि सबही लुटाइयै।
कह्यो 'कुँवा गिरौ' चले गिरन प्रसन्न हिये, जिये सुख पायौ ल्याये दरस दिखाइयै ।। २८३ ।।
किये शिष्य कृपा करी धरी हरिभक्ति हृदै, कही 'अब जावौ गृह सेवा साधु कीजियै।
बितये बरष जब सरस टहल जानि, सन्त सुख मानि आवैं घर मधि लीजियै' ।।
आये आज्ञा पाय धाम कीन्हीं अभिराम रीति, प्रीति कौ न पारावार चीठी लिखि दीजियै।
'हूजिये कृपाल वही बात प्रतिपाल करौं', चले जुग बीस जन संग मति रीझियै ।। २८४ ।।
कबीर रैदास आदि दास सब संग लिये आये पुर पास पीपा पालकी लै आयो है।
करी साष्टांग न्यारी-न्यारी बिनै साधुन को, धन को लुटाय सो समाज पधरायौ है ।।
जैसी कीन्हीं सेवा बहु मेवा नाना राग भोग, वानी के न जोग भाग कापै जात गायौ है।
जानी भक्ति रीति 'घर रहौ कै अतीत होहु', करिकै प्रतीति गुरु पग लगि धायौ है ।। २८५ ।।
लागी संग रानी दस दोय कही मानी नहीं, कष्ट को बतावैं डरपावैं मन लावहीं।
कामरीन फारि मधि मेखला पहिरि लेवो, देवो डारि आभरन जोपै नहीं भावहीं ।।
काहू पै न होय दियो रोय भोय भक्ति आई छोटी नाम सीता गरैं डारी न लजावहीं।
'यहू दूर डारौ करौ तन को उघारौ' कियो, द्रव्यौ रामानन्द हियौ पीपा न सुहावहीं ।। २८६ ।।
जोपै यापै कृपा करी दीजै काहू संग करि, मेरे नहीं रंग यामें कही बार-बार है।
सौंह को दिवाय दई लई तब कर धरि, चले ढरि विप्र एक छोड़ै न विचार है ।।
खायौ विष ज्यायौ पुनि फेरिकैं पठायौ सब, आयौ यों समाज द्वारावती सुखसार है।
रहे कोऊ दिन आज्ञा माँगी इन रहिवे की, कूदे सिन्धु माँझ चाह उपजी अपार है ।। २८७ ।।
आये आगे लैन आप दिये हैं पठाय जन, देखि द्वारावती कृष्ण मिले बहु भायकै।
महल-महल माँझ चहल-पहल लखी, रहे दिन सात सुख सकै कौन गायकै ।।
आज्ञा दई जाइवे की जाइवौ न चाहें हिये, पिये वह रूप 'देखौ मोहीं कौं जु जायकै'।
भक्त बूड़ि गयो यह बड़ोई कलंक भयौ, मेटौ तम अंक शंक गही अकुलायकै ।। २८८ ।।