सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 195 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 40

श्री गुह निषादजी) (२७
श्रीअलर्कजी
अलरक की कीरति में राँचौ नित साँचौ हिये, किये उपदेसहूँ न छूटै विषै वासना।
माता मन्दालसा की बड़ी यह प्रतिज्ञा सुनौ, आवै जो उदर माँझ फेरि गर्भ आस ना।।
पति को निहोरो ताते रह्यो छोटो कोरो ताको, लै गये निकालि मिलि काशी नृप शासना।
मुद्रिका उघारि और निहारि दत्तात्रेय जू को, भये भवपार करी प्रभु की उपासना।। ६३।।
तिन चरण धूरि मो भूरि सिर, जे जे हरिमाया तरे।।
रिभु इक्ष्वाकरु ऐल गाधि रघु रै गै शुचि शतधन्वा।
अमूरति अरु रन्तिदेव उतंग भूरि देवल वैवस्वत मान्वा।।
नहुष जजाति दिलीप, पुरु यदु गुह मान्धाता।
पिप्पल निमि भरद्वाज, दक्ष सरभंग संघाता।।
संजय समीक उत्तानपाद, याज्ञवल्क्य जस जग भरे।
तिन चरण धूरि मो भूरि सिरं, जे जे हरिमाया तरे।। १२।।
श्रीरन्तिदेवजी
अहो ! रन्तिदेव नृप सन्त दुष्यन्त वंश, अति ही प्रशंस सो अकाशवृत्ति लई है।
भूखे को न देखि सकैं आवै सो उठाइ देत, नेति नहिं करें भूखे देह छीन भई है।।
चालिस औ आठ दिन पाछे जल-अन्न आयो, दियो विप्र शूद्र नीच श्वान यह नई है।
हरि को निहारैं उन माँझ तब आये प्रभु, भाये जग दुख जिते भोगौं भक्ति छई है।। ८४।।
श्रीगुह निषादजी
भीलन को राजा गुह राम अभिराम प्रीति, भयो वनवास मिल्यो मारग में आइकै।
करौ यह राज जू विराजि सुख दीजै मोको, बोले चैनसाज तज्यौं आज्ञा पितु पाइकै।।
दारुन वियोग अकुलात दृग अश्रुपात, पाछे लोहू जात तब सकै कौन गाइकै।
रहै नैन मूँदि 'रघुनाथ बिन देखौं कहा?' अहा ! प्रेम रीति मेरे हिये रही छाइकै।। ६५।।
चौदह बरष पीछे आये रघुनाथ नाथ, साथ के जे भील कहैं आये प्रभु देखिये।
बोल्यो 'अब पाऊँ कहाँ होति न प्रतीति क्यो हू' प्रीति करि मिले राम कही मोको पेखिये।।
परसि पिछाने लपटाने सुखसागर समाने प्रान पाये मानो भाल भाग लेखिये।
प्रेम की जू बात क्यों हू वानी में समात नाहिं, अति अकुलात कह्यौ कैसे कै विशोखिये।। ६६।।
मास परायण चौथा विश्राम